ढिरिया – बुन्देलखण्ड का लोक नृत्य

ढिरिया बुन्देलखण्ड की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा एक पारंपरिक लोकनृत्य एवं लोक-अनुष्ठान माना जाता है। बुन्देलखण्ड की लोककलाओं में मिट्टी के पात्र, लोकगीत, पारिवारिक मंगल अवसर तथा धार्मिक आस्थाएँ विशेष महत्त्व रखते हैं। हालांकि, ढिरिया के स्वरूप और इसकी स्थानीय परंपराओं के बारे में क्षेत्रानुसार जानकारी अलग-अलग मिल सकती है।

बुंदेलखण्ड में क्वाँर की नौदेवियों में किशोरियाँ नौरता नामक एक धार्मिक भावों से भरा खेल खेलती हैं, जिसमें लोककलाओं का संगम मिलता है। उसमें गायन, नर्तन और चित्रांकन की लोककलाएँ खेल-खेल में सीखने की व्यवस्था है।

ढिरिया का अर्थ एवं परिचय
बुन्देली लोकजीवन में मिट्टी के पात्रों का उपयोग पूजा-पाठ, मांगलिक अवसरों और पारंपरिक रीति-रिवाजों में होता रहा है। ढिरिया शब्द का संबंध भी स्थानीय परंपरा में मिट्टी के पात्र से जोड़ा जाता है। इससे जुड़ी लोक-अभिव्यक्ति में गीत, लयबद्ध गति और सामुदायिक सहभागिता का महत्त्व हो सकता है।

बुन्देलखण्ड की लोकपरंपराएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे लोगों की धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक संबंधों, पारिवारिक संस्कारों और सामूहिक जीवन को भी अभिव्यक्त करती

ढिरिया नृत्य का अवसर एवं धार्मिक महत्त्व
ढिरिया की परंपरा विशेष रूप से क्वाँर मास के नौरता (सुअटा) उत्सव से जुड़ी हुई है। इस अवसर पर किशोरियाँ गौरा- महादेव की पूजा करती हैं। उत्सव के अंतिम दिन पूजा के बाद रात में ढिरिया या झिंकिया फिराने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ लोकगीत, सामूहिक नृत्य और घर-घर जाकर मंगलकामनाएँ देने की भावना जुड़ी हुई है।

ढिरिया बनाने की विधि
ढिरिया बनाने के लिए मिट्टी की मटकी का उपयोग किया जाता है। मटकी के ऊपरी भाग में चारों ओर छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं। मटकी के आधे भाग में राख भरी जाती है। उसके भीतर तेल-बाती वाला दीपक जलाकर रखा जाता है। छेदों से छनकर निकलने वाला प्रकाश मटकी को आकर्षक रूप देता है।

ढिरिया नृत्य की प्रमुख विशेषताएँ
सामूहिक नृत्य
किशोरियाँ ढिरिया के चारों ओर घेरा बनाकर नृत्य करती हैं। इसमें समूह की एकता और सामूहिक सहभागिता प्रमुख होती है।

लोकगीत गायन
नृत्य के साथ बुन्देली लोकगीत गाए जाते हैं। गीतों में मंगलकामना, परिवार की समृद्धि और संतान के सुख की अभिव्यक्ति मिलती है।

दीपक और मिट्टी की मटकी
छिद्रयुक्त मटकी में जलता दीपक इस परंपरा का प्रमुख आकर्षण है। प्रकाश और सामूहिक गति से इसका विशिष्ट लोक-सौंदर्य बनता है।

क्वाँर शुक्ल नवमी खेल का अंतिम दिन होता है, जिसमें पूजा के बाद सभी किशोरियाँ गौरा-महादेव की मूर्तियाँ सिराने तालाब या नदी जाती हैं और सिराकर पीछे की ओर नहीं देखतीं। रात्रि होते ही ढिरिया या झिंकिया फिराई जाती है।

एक मटकी के ऊपरी भाग में चारों ओर छेद कर लिए जाते हैं। फिर आधे भाग में राख भरकर उस पर एक दीपक में तेल-बाती डालकर उसे जलाकर रख देते हैं। उसे ही ढिरिया या झिंझिया कहते हैं। एक किशोरी ढिरिया को अपने सिर पर रख लेती है और आगे-आगे चलती है। उसके पीछे सब किशोरियाँ रहती हैं। वे सब बारी-बारी से पास-पड़ोस के घरों में जाती हैं और हर घर के द्वार पर खड़े होकर गाती हैं –

तुम जिन जानो भौजी माँगने, नारे सुअटा, घर घर देत असीस।
पूत जो पारो भौजी पालने, नारे सुअटा, बिटियन अच्छत देव।
लै अच्छत भौजी निग चली, चँदने रिपटो पाँव।
चँदने रिपटीं भौजी गिर परीं, नारे सुअटा, अच्छत गये बगराय।
जितने अच्छत भौजी भौं परे, नारे सुअटा, तितने दुलैया तोरें पूत।
पूतन पूतन भौजी घर भरै, नारे सुअटा, बहुअन भरै चितसार।।

गीत के साथ ढिरिया के चारों ओर घेरा बनाकर वे नृत्य करती हैं। इस नृत्य में पद और हस्त-चालन से तो रहता ही है, पर मुख मुद्रा की अभिव्यक्ति भी असरदार होती है। यह नृत्य अधिकतर सम पर रहता है, दु्रत पर कम ही जाता है। फिर भी इससे लोकनृत्य की सीख मिलती हैं। वस्तुतः इस नृत्य में उस आदिम नृत्य की प्रतिच्छाया है, जो अग्नि के चारों ओर घेरा बनाकर किया जाता था। स्पष्ट है कि इन लोकनृत्यों में आदिम नृत्यों का बढ़ाव ही है।

ढिरिया नृत्य का सांस्कृतिक महत्त्व
ढिरिया बुन्देलखण्ड की लोकसंस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण पक्षों को सामने लाता है। 

1- धार्मिक आस्था: गौरा-महादेव की पूजा और नौरता उत्सव से इसका संबंध।

2- लोकगीतों का संरक्षण: बुन्देली भाषा, पारंपरिक गीतों और मौखिक साहित्य का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण।

3- सामाजिक एकता: किशोरियों का सामूहिक रूप से घर-घर जाना और मंगलकामनाएँ देना।

4- लोककला की शिक्षा: गायन, नृत्य, ताल, भाव-भंगिमा और पारंपरिक रीति-रिवाजों को सीखने का अवसर।

5- सांस्कृतिक पहचान: बुन्देलखण्ड की विशिष्ट लोकपरंपराओं और ग्रामीण जीवन के संरक्षण में योगदान।

वर्तमान स्थिति एवं संरक्षण
आधुनिक जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण अनेक पारंपरिक लोककलाओं का नियमित अभ्यास कम हो रहा है। ढिरिया जैसी परंपराओं को जीवित रखने के लिए विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और लोकमंचों पर इनके प्रदर्शन, लोकगीतों का दस्तावेजीकरण तथा बुजुर्ग लोककलाकारों से मौखिक इतिहास का संकलन उपयोगी हो सकता है।

बुन्देलखण्ड की लोक नृत्य कला 

संदर्भ-
बुंदेली लोक साहित्य परंपरा और इतिहास – डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुंदेली लोक संस्कृति और साहित्य – डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुन्देलखंड की संस्कृति और साहित्य – श्री राम चरण हयारण “मित्र”
बुन्देलखंड दर्शन – मोतीलाल त्रिपाठी “अशांत”
बुंदेली लोक काव्य – डॉ. बलभद्र तिवारी
बुंदेली काव्य परंपरा – डॉ. बलभद्र तिवारी
बुन्देली का भाषाशास्त्रीय अध्ययन -रामेश्वर प्रसाद अग्रवाल

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