HomeरंगमंचBundelkhand Ka Shastriya Rangmanch Vidhan बुंदेलखंड का शास्त्रीय रंगमंच विधान

Bundelkhand Ka Shastriya Rangmanch Vidhan बुंदेलखंड का शास्त्रीय रंगमंच विधान

बुंदेलखंड का रंगमंच केवल लोकनाट्य परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें भारतीय शास्त्रीय रंगपरंपरा में भी गहराई से निहित हैं। इस दृष्टि से Bundelkhand Ka Shastriya Rangmanch Vidhan भारतीय नाट्य परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक जीवन का समन्वित रूप है।

यद्यपि बुंदेलखंड में संस्कृत नाटकों के मंचन का प्राचीन इतिहास सीमित रूप में उपलब्ध है, फिर भी यहाँ की रंग-चेतना, मंदिर-नृत्य, धार्मिक उत्सव, रामलीला, रासलीला तथा लोकनाट्य परंपराओं में भारतीय शास्त्रीय नाट्यशास्त्र के अनेक तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

1- शास्त्रीय रंगमंच की अवधारणा
भारतीय शास्त्रीय रंगमंच का मूल आधार नाट्यशास्त्र है। भरतमुनि ने नाट्य को ‘पंचम वेद’ की संज्ञा देते हुए इसे समाज के सभी वर्गों के मनोरंजन एवं शिक्षण का माध्यम माना। शास्त्रीय रंगमंच के प्रमुख अंग हैं-
1- रंगमंच (प्रेक्षागृह)
2- अभिनेता
3- निर्देशक (सूत्रधार)
4- नाटक
5- संगीत
6- नृत्य
7- अभिनय
8- वेशभूषा
9- रंगसज्जा
10- रस एवं भाव
इन सभी तत्वों का प्रभाव बुंदेलखंड की पारंपरिक एवं आधुनिक रंग परंपराओं में देखा जा सकता है।

2- बुंदेलखंड की शास्त्रीय रंग परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बुंदेलखंड प्राचीन काल में चेदि, दशार्ण, जेजाकभुक्ति और चंदेल संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा। विशेषतः- खजुराहो के मंदिर, देवगढ़, ओरछा, दतिया, कालिंजर । इन सभी क्षेत्रों में नृत्य, संगीत एवं अभिनय की समृद्ध परंपरा विद्यमान रही। विशेषकर चंदेलकाल (9वीं–13वीं शताब्दी) में मंदिरों की मूर्तियों में नृत्य, वादन, अभिनय तथा नाट्य मुद्राओं का अत्यंत सुंदर अंकन मिलता है। इन मूर्तियों से स्पष्ट होता है कि उस समय नाट्यकला सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग थी।

3- नाट्यशास्त्र का प्रभाव
भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का प्रभाव बुंदेलखंड की अनेक रंग परंपराओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

(क) रस सिद्धांत
नवरस-  श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शान्त

बुंदेलखंड में-
आल्हा गायन में वीर रस, रामलीला में करुण एवं शान्त रस, राई नृत्य में श्रृंगार, स्वांग में हास्य रस का अत्यधिक प्रभाव मिलता है।

(ख) अभिनय
नाट्यशास्त्र में अभिनय चार प्रकार का माना गया है-

1- आंगिक अभिनय
शरीर की मुद्राएँ, हाथ, नेत्र, गर्दन, मुखाभिनय, चाल । राई एवं स्वांग में इसका उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।

2- वाचिक अभिनय
संवाद, गीत, लोकभाषा, बुन्देली बोली। आल्हा गायन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

3- आहार्य अभिनय
वेशभूषा, आभूषण, श्रृंगार, मुखौटे, अस्त्र-शस्त्र । रामलीला एवं रासलीला में इसका विशेष महत्व है।

4- सात्त्विक अभिनय
भावों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति जैसे- अश्रु, रोमांच, कम्पन, भय, उत्साह ।

4- रंगमंच विधान
नाट्यशास्त्र में तीन प्रकार के रंगमंच बताए गए हैं-
(1) विकृष्ट
(2) चतुरस्र
(3) त्र्यस्र
बुंदेलखंड में स्थायी प्रेक्षागृह कम थे। अधिकांश मंच होते थे मंदिर प्रांगण, चौपाल, किले, राजदरबार, खुले मैदान जहाँ दर्शक चारों ओर बैठते थे।

5- सूत्रधार की परंपरा
शास्त्रीय रंगमंच में सूत्रधार नाटक का परिचय देता है। पात्रों का परिचय कराता है। कथा का उद्देश्य बताता है। बुंदेलखंड के स्वांग एवं रामलीला में आज भी कथावाचक या व्यास इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

6- संगीत विधान
शास्त्रीय रंगमंच में संगीत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। बुंदेलखंड में प्रयोग होने वाले प्रमुख वाद्य- मृदंग, पखावज, तबला, ढोलक, नगाड़ा, शहनाई, बांसुरी,मंजीरा, सारंगी, हारमोनियम (आधुनिक काल)

7- नृत्य विधान
शास्त्रीय नृत्य तत्वों का प्रभाव-
राई
दिवारी
बधाई
रास / कृष्णलीला में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

8- वेशभूषा
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार पात्रानुकूल वस्त्र धारण किए जाते थे। उदाहरण….
राजा-  (मुकुट, राजसी पोशाक)
ऋषि- (जटा, कमंडल)
देवी- (आभूषण, मुकुट)
योद्धा- (कवच, तलवार)

9- रंगसज्जा
बुंदेलखंड में पारंपरिक मंच सज्जा अत्यंत सरल होती थी-
रंगीन पर्दे
दीपक
केले के स्तम्भ
फूलों की सजावट
ध्वज
प्राकृतिक दृश्य

10- भाषा
शास्त्रीय नाटकों की भाषा संस्कृत थी। किन्तु बुंदेलखंड में संस्कृत, ब्रज, बुन्देली, अवधी, हिन्दी का मिश्रित प्रयोग देखने को मिलता है।

11- धार्मिक एवं राजकीय संरक्षण
चंदेल शासकों ने मंदिर, नृत्य, संगीत, कलाकारों को संरक्षण दिया। बाद में ओरछा तथा दतिया के राजदरबारों में भी नाट्य एवं संगीत को प्रोत्साहन मिला।

12- शास्त्रीय तत्वों का लोकनाट्य में रूपांतरण
बुंदेलखंड की प्रमुख लोकनाट्य परंपराएँ-
रामलीला
रासलीला
स्वांग
नौटंकी
आल्हा
राई
इन सभी में निम्न शास्त्रीय तत्व आज भी सुरक्षित हैं—

शास्त्रीय तत्व

बुंदेलखंड में स्वरूप

रस

वीर, करुण, हास्य, श्रृंगार

अभिनय

आंगिक, वाचिक, सात्त्विक

संगीत

ध्रुपद, लोकधुन, भजन

नृत्य

राई, रास

सूत्रधार

व्यास, कथावाचक

रंगमंच

खुला मंच

वेशभूषा

पात्रानुकूल

13- समकालीन संदर्भ
आज बुंदेलखंड का आधुनिक रंगमंच भी शास्त्रीय सिद्धांतों से प्रेरणा लेता है। रंगकर्मी अभिनय-प्रशिक्षण, मंच-सज्जा, प्रकाश-योजना और चरित्र-निर्माण में नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। अनेक नाट्य कार्यशालाओं में भरतमुनि के रस-सिद्धांत और अभिनय-विधान को प्रशिक्षण का आधार बनाया जाता है।

निष्कर्ष
बुंदेलखंड का शास्त्रीय रंगमंच विधान भारतीय नाट्य परंपरा का स्थानीय रूपांतरण है। यहाँ संस्कृत नाट्य की औपचारिक परंपरा अपेक्षाकृत सीमित रही, किंतु उसके मूल सिद्धांत—रस, अभिनय, संगीत, नृत्य, सूत्रधार, वेशभूषा और रंगमंच-विन्यास—लोक और धार्मिक रंगरूपों में जीवित रहे। यही कारण है कि बुंदेलखंड की रंगसंस्कृति में शास्त्रीयता और लोकधर्मिता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह समन्वय इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाता है और आधुनिक रंगमंच को भी एक सशक्त वैचारिक एवं कलात्मक आधार प्रदान करता है।

बुंदेलखंड में नौटंकी परंपरा 

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Bundeli Jhalak: The Cultural Archive of Bundelkhand. Bundeli Jhalak Tries to Preserve and Promote the Folk Art and Culture of Bundelkhand and to reach out to all the masses so that the basic, Cultural and Aesthetic values and concepts related to Art and Culture can be kept alive in the public mind.
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