खेरापति Kherapati या खेरादेव बुन्देलखण्ड के प्रमुख ग्राम्य लोक देवताओं में माने जाते हैं। बुन्देलखण्ड की लोक-परंपरा में ग्राम देवताओं का विशेष महत्त्व है। ऐसी लोकमान्यता है कि खेरापति गाँव के लोगों की अनेक प्रकार की आपत्तियों-विपत्तियों से रक्षा करते हैं तथा गाँव में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखते हैं।
गाँवों में खेरापति की पूजा के लिए चबूतरे बनाए जाते हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, कुछ स्थानों पर ऐसे चबूतरों को बूढ़े बाबा, खाकी बाबा, भैरों बाबा और सिद्ध बाबा जैसे नामों से भी जाना जाता है। हालाँकि, इन नामों और खेरापति की पहचान में स्थानीय क्षेत्र के अनुसार भिन्नता हो सकती है।
खेरापति की पूजा ग्रामीण जनजीवन, लोकविश्वास और पारंपरिक धार्मिक संस्कारों से गहराई से जुड़ी हुई है। गाँव के लोग संकट के समय इन लोक देवताओं का स्मरण करते हैं और अपनी तथा अपने परिवार की कुशलता के लिए प्रार्थना करते हैं। इनकी पूजा-पद्धति प्रायः स्थानीय रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं पर आधारित होती है।
खेरापति जैसे ग्राम देवताओं की परंपरा बुन्देलखण्ड की प्राचीन लोकआस्थाओं और सामुदायिक जीवन की परिचायक है। इनकी मान्यताओं में प्रकृति, गाँव की सुरक्षा और सामूहिक कल्याण के प्रति ग्रामीण समाज की भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं।
निष्कर्षतः, खेरापति बुन्देलखण्ड की लोकसंस्कृति और लोकविश्वास के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनके चबूतरे, पूजा-परंपराएँ और उनसे जुड़ी मान्यताएँ बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को समझने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
