एक गाँओं में दो भइया रहत थे। बड़े को नाम कुन्दन, छोटे को नाम नन्दन हतो । बे भोतई गरीब हते। बे गाँओं में मेहनत मजूरी करके अपनो पेट भरत…
Category: बुन्देलखण्ड का सहित्य

How the folk literature and Hindi literature of Bundelkhand originated and developed and through which stages it reached here today.
पण्डा पहलवान-बुन्देली लोक कथा
गंगा किनारे एक गाँओं हतो किसनपुर। जा गाँओं के लोग राधाकिसनजी के भोत भक्त थे। बिनने गाँओं में राधाकिसन को मन्दिर बनबाओ । मन्दिर बन गओ तो पूजा के लाने…
दिल्ली की गप्प-बुन्देली लोक कथा
आज एक किस्सा सुना राये दिल्ली की गप्प । एक हतो दिल्ली को पहलबान, बाय अपनी ताकत पे भोत गुमान हतो । बाने भोत से दंगल जीते थे। दिल्ली के असफेर…
जैसे को तैसा-बुन्देली लोक कथा
एक माताराम हतीं बाको एकई मोड़ा हतो । जब मोड़ा बड़ो हो गओ तो माताराम ने मोड़ा को धूमधाम से व्याव कर दओ । माताराम ने मोड़ा के लाने किराने…
जादुई संख-बुन्देली लोक कथा
गाँओं में एक साधु बाबा रहत थे। बिनकी कुटिया गाँओं से बाहर नदी के किनारे थी। साधू बाबा के पास एक जादुई संख हतो । एक आदमी बिनको चेला हतो ।…
चिड़ा-चिड़ी-बुन्देली लोक कथा
इमली के पेड़ पर चिड़ा-चिड़ी रहते थे। एक दिना कहीं से, चिड़ा लाओ दाल को दाना और चिड़ी लाई चाबल को दाना दोई ने मिलके हड़िया में खिचड़ी पकाई । चिड़ी,…
सुभाष सिंघई की छंदवद्ध रचनाएं
श्री सुभाष सिंघई बुन्देलखण्ड के ऐसे साहित्यकार है जिन्हे कलम का सिपाही भी कहते है । कलम का सिपाही यानि पत्रकारिता का प्रतिविम्ब जो बिना रुके- बिना झुके लिखता जाता…
सुभाष सिंघई की बुन्देली रचनाएं
श्री सुभाष सिंघई बुन्देलखण्ड के ऐसे साहित्यकार है जिन्हे कलम का सिपाही भी कहते है । कलम का सिपाही यानि पत्रकारिता का प्रतिविम्ब जो बिना रुके- बिना झुके लिखता जाता…
Prabhudayal Shrivastav Ki Bundeli Kavitayen प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बुन्देली कविताएं
बुंदेली चौकड़िया (पानी बरसत नइँयां) जाने का हैं राम करइँयां , पानी बरसत नइँयां। आईं नइँ जमड़ार जामनें , ससकन लगीं तलइँयां। सूने लगें खेत फसलन बिन,डरीं न सगुन हरइँयां।…
Rang Ki Saugandh रंग की सौगन्ध
आहिस्ता-आहिस्ता मेरे कपोलों पर, मेरे वक्षस्थल पर रंग लेप किया फिर अपने रंग में रंगा देख कर खिलखिला पड़ी। बोली-“कितने अच्छे लग रहे हैं आप। आपसे एक निवेदन है, कि…
