प्राचीन भारतीय संस्कृति में मृद्भांड अर्थात मिट्टी के बर्तनों का विशेष महत्त्व रहा है। मिट्टी के बर्तन मानव सभ्यता के प्रारंभिक उपयोगी आविष्कारों में से एक हैं। इनके माध्यम से प्राचीन मनुष्य के रहन-सहन, खान-पान, भोजन पकाने, जल संग्रह करने, कृषि, व्यापार, धार्मिक अनुष्ठानों तथा कलात्मक अभिरुचियों की जानकारी प्राप्त होती है। पुरातात्त्विक उत्खननों में प्राप्त मृद्भांड प्राचीन सभ्यताओं की पहचान, उनके काल निर्धारण और सांस्कृतिक विकास को समझने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में मिट्टी के बर्तनों के निर्माण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। प्रारंभ में हाथ से बनाए गए बर्तनों का प्रचलन था। कालांतर में कुम्हार के चाक के उपयोग से बर्तन अधिक सुडौल, सममित और विविध आकारों में बनने लगे। मिट्टी को साफ करना, उसमें आवश्यकतानुसार बालू या अन्य पदार्थ मिलाना, उसे आकार देना, सुखाना, सतह पर लेप लगाना तथा आग में पकाना—ये सभी प्रक्रियाएँ मृद्भांड निर्माण की विकसित तकनीक का हिस्सा थीं।
हड़प्पा सभ्यता के समय तक मृद्भांड निर्माण एक विकसित शिल्प बन चुका था। इस काल के बर्तन अपनी उपयोगिता, विविध आकारों, सुंदर रंग-संयोजन और चित्रात्मक अलंकरण के कारण विशेष उल्लेखनीय हैं।
हड़प्पा सभ्यता में मृद्भांड निर्माण
हड़प्पा सभ्यता, जिसका परिपक्व चरण लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व माना जाता है, मृद्भांड निर्माण की उन्नत परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल तथा अन्य पुरातात्त्विक स्थलों से बड़ी संख्या में मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं। इनसे तत्कालीन कुम्हारों की तकनीकी दक्षता और कलात्मक प्रतिभा का परिचय मिलता है।
हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश बर्तन अच्छी तरह तैयार की गई मिट्टी से बनाए जाते थे। इनमें से बहुत से बर्तन चाक पर निर्मित थे और उचित ताप पर पकाए जाते थे। सामान्य उपयोग के लिए मोटे तथा अपेक्षाकृत साधारण बर्तन बनाए जाते थे, जबकि विशेष प्रयोजनों के लिए सुडौल, चिकनी सतह वाले और चित्रित बर्तनों का निर्माण किया जाता था।
इस काल के बर्तनों में लाल मृद्भांड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनकी सतह पर लाल रंग का पतला लेप लगाया जाता था, जिसे अंग्रेजी में स्लिप (Slip) कहा जाता है। इसके ऊपर प्रायः काले रंग से ज्यामितीय आकृतियाँ, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों तथा अन्य प्रतीकों के चित्र बनाए जाते थे। लाल पृष्ठभूमि पर काले रंग की चित्रकारी हड़प्पाई मृद्भांडों की विशिष्ट पहचान बन गई थी। हालाँकि सभी बर्तन चित्रित नहीं होते थे; बड़ी संख्या में सादे बर्तन भी मिलते हैं।
हड़प्पाई मृद्भांडों के प्रमुख प्रकार
हड़प्पा सभ्यता में दैनिक जीवन, भंडारण, भोजन परोसने और धार्मिक गतिविधियों के लिए अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाए जाते थे। उनके प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं।
सादे मृद्भांड
सादे बर्तनों पर सामान्यतः चित्रकारी या विस्तृत अलंकरण नहीं होता था। इनका उपयोग भोजन पकाने, पानी रखने, अनाज संग्रह करने तथा दैनिक घरेलू कार्यों में किया जाता था। इनमें कटोरे, थालियाँ, प्याले, घड़े और बड़े भंडारण पात्र प्रमुख थे।
लाल रंग के चित्रित बर्तन
इन बर्तनों की सतह पर लाल रंग का लेप लगाया जाता था और उसके ऊपर काले रंग से चित्र बनाए जाते थे। कहीं-कहीं अन्य रंगों का प्रयोग भी मिलता है। चित्रों में सीधी और टेढ़ी रेखाएँ, वृत्त, त्रिभुज, जालीनुमा आकृतियाँ तथा प्राकृतिक वस्तुओं से प्रेरित रूप प्रमुख हैं।
नुकीली पेंदी वाले प्याले और पात्र
कुछ हड़प्पाई पात्रों का निचला भाग नुकीला अथवा संकरा होता था। इनमें छोटे प्याले और लंबे पात्र उल्लेखनीय हैं। इनका वास्तविक उपयोग उनके आकार और प्राप्ति-स्थल के आधार पर समझने का प्रयास किया जाता है। ऐसे सभी पात्रों के प्रयोजन के विषय में निश्चित निष्कर्ष उपलब्ध नहीं हैं।
बहुच्छिद्रयुक्त मृद्भांड
हड़प्पा सभ्यता के विशिष्ट बर्तनों में छिद्रयुक्त पात्रों का विशेष स्थान है। ये प्रायः लंबे, बेलनाकार आकार के होते थे और इनके शरीर पर अनेक छोटे छिद्र बने होते थे। इनके उपयोग के संबंध में विभिन्न मत प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ विद्वान इन्हें छानने, गर्म करने अथवा सुगंधित पदार्थों से संबंधित कार्यों के लिए प्रयुक्त मानते हैं, लेकिन इनके वास्तविक प्रयोजन पर पूर्ण सहमति नहीं है।
बड़े भंडारण पात्र
अनाज, खाद्य सामग्री और अन्य वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए बड़े आकार के घड़े तथा भंडारण पात्र बनाए जाते थे। इनका मुँह प्रायः चौड़ा और शरीर अपेक्षाकृत बड़ा होता था। कुछ पात्रों को लाल लेप और चित्रों से सजाया जाता था। इनसे कृषि, खाद्य संग्रह और घरेलू व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
थालीयुक्त ऊँचे पात्र
ऐसे बर्तनों में एक ऊँचे आधार या दंड के ऊपर थाली जैसी आकृति बनी होती थी। इन्हें अंग्रेजी में Dish-on-Stand कहा जाता है। इनका उपयोग भोजन परोसने, वस्तुएँ रखने अथवा संभवतः कुछ अनुष्ठानों में किया जाता होगा। इनका निश्चित प्रयोजन सभी स्थलों पर समान रहा हो, यह आवश्यक नहीं है।
लघु मृद्भांड और पशु-आकृति वाले पात्र
हड़प्पाई पुरास्थलों से छोटे आकार के पात्र और पशु-आकृतियों से संबंधित मृण्मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं। लघु बर्तनों का उपयोग खिलौनों, अनुष्ठानों अथवा विशेष प्रयोजनों में हुआ हो सकता है। पशु-आकृति वाले सभी अवशेषों को वास्तविक उपयोग के बर्तन मानना उचित नहीं है; उनमें से कुछ स्वतंत्र कलाकृतियाँ भी हो सकती हैं।
मृद्भांडों पर चित्रांकन और अलंकरण
हड़प्पा सभ्यता के चित्रित मृद्भांड प्राचीन भारतीय कला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन पर अंकित आकृतियाँ तत्कालीन कलाकारों की कल्पनाशक्ति, प्रकृति के प्रति रुचि और सजावटी अभिरुचि का परिचय देती हैं।
इन बर्तनों पर प्रमुख रूप से निम्नलिखित प्रकार के चित्र मिलते हैं—
1- ज्यामितीय आकृतियाँ: सीधी, टेढ़ी-मेढ़ी, लहरदार तथा समानांतर रेखाएँ, वृत्त, त्रिभुज और अर्धवृत्त।
2- रेखात्मक अलंकरण: बिंदुओं की पंक्तियाँ, जालीदार आकृतियाँ, कंघीनुमा रेखाएँ और विभिन्न प्रकार के पट्टे।
3- सूर्य और तारानुमा आकृतियाँ: गोलाकार तथा किरणों जैसी रेखाओं से निर्मित सजावटी रूप।
4- वनस्पति संबंधी चित्र: फूल-पत्तियाँ, पीपल के पत्ते तथा अन्य पौधों से प्रेरित आकृतियाँ।
5- पशु-पक्षियों के चित्र: मछली, मोर तथा अन्य पक्षियों और पशुओं की आकृतियाँ।
6- प्राकृतिक दृश्य: कुछ बर्तनों पर वृक्षों, पशुओं तथा प्राकृतिक परिवेश से प्रेरित चित्र मिलते हैं।
इनमें ज्यामितीय अलंकरण विशेष रूप से प्रचलित था। कुछ चित्रों में प्राकृतिक आकृतियों को शैलीबद्ध रूप दिया गया है। पीपल के पत्ते और मोर जैसे रूप हड़प्पाई चित्रकला के उल्लेखनीय उदाहरण हैं। चित्रों को प्रायः बर्तन के ऊपरी भाग, गर्दन या कंधे के आसपास पट्टियों में व्यवस्थित किया जाता था।
प्राचीन भारत की प्रमुख मृद्भांड परंपराएँ
प्राचीन भारत में विभिन्न क्षेत्रों और कालखंडों में अनेक प्रकार की मृद्भांड परंपराएँ विकसित हुईं। उनके रंग, निर्माण तकनीक, सतह की चमक और चित्रांकन के आधार पर पुरातत्त्वविद उनका वर्गीकरण करते हैं। इनमें निम्नलिखित परंपराएँ विशेष उल्लेखनीय हैं।
लाल मृद्भांड परंपरा (Red Ware)
लाल मृद्भांड भारतीय पुरातत्त्व में अत्यंत व्यापक रूप से पाए जाते हैं। इनका लाल रंग मुख्यतः मिट्टी में उपस्थित लौह यौगिकों और पकाने की परिस्थितियों से संबंधित होता है। कुछ बर्तनों की सतह पर लाल गेरू अथवा लौह-युक्त पदार्थों से तैयार लेप लगाया जाता था।
इस परंपरा के अंतर्गत साधारण घरेलू बर्तनों से लेकर चित्रित घड़ों, कटोरों, थालियों और भंडारण पात्रों तक अनेक रूप मिलते हैं। हड़प्पा सभ्यता में लाल सतह पर काले रंग से चित्रित बर्तन विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। लाल मृद्भांड किसी एक सभ्यता या काल तक सीमित नहीं थे; वे भारतीय उपमहाद्वीप की अनेक पुरातात्त्विक संस्कृतियों में अलग-अलग रूपों में मिलते हैं।
चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware)
चित्रित धूसर मृद्भांडों को अंग्रेजी में Painted Grey Ware (PGW) कहा जाता है। इनका संबंध मुख्यतः उत्तर भारत के गंगा-यमुना दोआब, हरियाणा तथा आसपास के क्षेत्रों की लौह युगीन पुरातात्त्विक संस्कृति से है। इस परंपरा का सामान्य काल लगभग 1200 से 600 ईसा पूर्व माना जाता है, यद्यपि विभिन्न स्थलों पर इसकी तिथियों में अंतर मिलता है।
इन बर्तनों का रंग धूसर होता है और इनकी सतह पर काले रंग से रेखाएँ, वृत्त, बिंदु तथा अन्य ज्यामितीय आकृतियाँ बनाई जाती थीं। ये प्रायः महीन मिट्टी से बने, चाक पर तैयार किए गए और अच्छी तरह पकाए गए बर्तन होते थे।
चित्रित धूसर मृद्भांडों में कटोरे और थालियाँ प्रमुख हैं। हस्तिनापुर तथा अहिच्छत्र जैसे स्थलों से प्राप्त अवशेष इस परंपरा के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्रित धूसर मृद्भांडों को केवल रंग के आधार पर किसी एक ऐतिहासिक समुदाय या ग्रंथ में वर्णित समाज से सीधे जोड़ना उचित नहीं है। इनके अध्ययन में पुरातात्त्विक संदर्भ भी महत्त्वपूर्ण होते हैं।
उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड (Northern Black Polished Ware)
उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांडों को अंग्रेजी में Northern Black Polished Ware (NBPW) कहा जाता है। यह प्राचीन भारत की अत्यंत विशिष्ट और विकसित मृद्भांड परंपरा है। इसका प्रचलन मुख्यतः लगभग सातवीं-छठी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक माना जाता है। अलग-अलग स्थलों पर इसकी तिथियाँ भिन्न हो सकती हैं।
इन बर्तनों की सबसे प्रमुख विशेषता इनकी चिकनी, चमकदार और प्रायः काली अथवा गहरे धूसर रंग की सतह है। कुछ बर्तनों पर धातु जैसी चमक दिखाई देती है। इनकी सतह को विशेष तकनीक से तैयार और परिष्कृत किया जाता था। इन्हें केवल सामान्य काले रंग से रंगे हुए बर्तन समझना उचित नहीं है, क्योंकि इनकी चमक और निर्माण तकनीक इन्हें अन्य मृद्भांडों से अलग पहचान देती है।
इस परंपरा में कटोरे, थालियाँ, प्याले और अन्य छोटे पात्र प्रमुख हैं। इसके अवशेष गंगा के मैदान के अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं। इनका प्रसार प्राचीन नगरों, व्यापारिक गतिविधियों और विकसित शिल्प परंपराओं के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांडों का संबंध महाजनपदों, नगरों के विकास तथा मौर्यकालीन सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ा जाता है। हालाँकि यह परंपरा केवल मौर्यकाल तक सीमित नहीं थी और न ही इसके सभी अवशेष मौर्यकालीन स्थलों से ही प्राप्त हुए हैं।
मृद्भांड निर्माण की तकनीक
प्राचीन भारतीय कुम्हार मिट्टी के चयन और उसके प्रसंस्करण में दक्ष थे। अच्छी गुणवत्ता वाले बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ किया जाता था और उसमें आवश्यकतानुसार अन्य पदार्थ मिलाए जाते थे। इसके बाद मिट्टी को हाथ या चाक की सहायता से इच्छित आकार दिया जाता था।
बर्तन को आकार देने के बाद उसे सुखाया जाता था। कुछ बर्तनों पर लाल या अन्य रंगों का लेप लगाया जाता और फिर चित्रकारी की जाती थी। अंत में बर्तन को नियंत्रित तापमान पर पकाया जाता था। ताप, ऑक्सीजन की उपलब्धता और मिट्टी की संरचना के अनुसार बर्तन का रंग तथा मजबूती प्रभावित होती थी।
हड़प्पाई कुम्हारों ने चाक, सतह परिष्करण, रंगों और पकाने की तकनीकों का कुशल उपयोग किया। उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांडों की चमकदार सतह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारत में मृद्भांड निर्माण की तकनीक समय के साथ अत्यंत परिष्कृत हुई।
सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्त्व
मृद्भांड केवल घरेलू उपयोग की वस्तुएँ नहीं थे। वे प्राचीन समाज के अनेक पक्षों को समझने में सहायता करते हैं।
दैनिक जीवन: घड़े, कटोरे, थालियाँ और अन्य पात्र भोजन पकाने, परोसने, जल रखने तथा खाद्य सामग्री के संग्रह में उपयोगी थे।
कृषि और भंडारण: बड़े आकार के बर्तन अनाज और अन्य वस्तुओं के संग्रह के लिए उपयोग किए जाते थे। इससे कृषि आधारित जीवन और खाद्य प्रबंधन की जानकारी मिलती है।
व्यापार और शिल्प: बर्तनों के आकार, मिट्टी, निर्माण तकनीक और वितरण का अध्ययन स्थानीय शिल्प उत्पादन तथा विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्कों को समझने में सहायक है।
धार्मिक एवं अनुष्ठानिक गतिविधियाँ: कुछ मृद्भांड विशेष स्थलों, समाधियों या अनुष्ठानिक संदर्भों में प्राप्त हुए हैं। ऐसे प्रमाण बताते हैं कि कुछ बर्तनों का उपयोग सामान्य घरेलू कार्यों से आगे भी होता था।
कला और सौंदर्यबोध: चित्रित बर्तन प्राचीन कलाकारों की कल्पनाशक्ति, रंगों के चयन तथा ज्यामितीय और प्राकृतिक रूपों की समझ को प्रदर्शित करते हैं।
काल निर्धारण: विभिन्न कालखंडों में प्रचलित मृद्भांडों के स्वरूप और तकनीक में अंतर पाया जाता है। इसलिए पुरातात्त्विक उत्खननों में मृद्भांडों का अध्ययन सांस्कृतिक स्तरों और उनके काल निर्धारण में उपयोगी होता है।
निष्कर्ष
प्राचीन भारतीय संस्कृति में मृद्भांडों का इतिहास तकनीकी विकास, दैनिक जीवन और कलात्मक अभिव्यक्ति की एक महत्त्वपूर्ण यात्रा है। हड़प्पा सभ्यता के लाल रंग पर काले चित्रों वाले बर्तनों से लेकर चित्रित धूसर मृद्भांडों और उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांडों तक, प्रत्येक परंपरा अपने समय की विशेषताओं को प्रकट करती है।
इन बर्तनों के माध्यम से प्राचीन भारतीय समाज की भोजन संबंधी आदतों, शिल्प-कौशल, व्यापार, धार्मिक गतिविधियों और सौंदर्यबोध का अध्ययन किया जा सकता है। मिट्टी जैसे सामान्य प्राकृतिक पदार्थ को उपयोगी और कलात्मक वस्तु में बदलने की क्षमता भारतीय कुम्हारों की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।
इस प्रकार मृद्भांड भारतीय पुरातात्त्विक विरासत का अभिन्न अंग हैं। वे केवल अतीत के अवशेष नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय जीवन, कला और सभ्यता के विकास को समझने के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत भी हैं।
