लमटेरा – बुन्देलखण्ड का भजन शैली में यात्रा गीत

लमटेरा का अर्थ एवं परिचय
‘लमटेरा’ बुन्देलखण्ड का एक पारम्परिक लोकगीत है, जिसे मुख्यतः यात्रा के दौरान सामूहिक रूप से गाया जाता है। ‘लमटेरा’ शब्द का सम्बन्ध ‘लम्बी टेर’ से माना जाता है। टेर का अर्थ है किसी को दूर से आवाज देना अथवा लम्बे स्वर में पुकारना। इस प्रकार लम्बी टेर के साथ गाए जाने वाले गीत लमटेरा कहलाते हैं। ये गीत विशेष रूप से पर्व-त्योहारों पर नदी, सरोवर अथवा तीर्थस्थलों में स्नान करने जाते समय मार्ग में गाए जाते हैं। मकर संक्रान्ति जैसे पर्वों पर इनका विशेष महत्त्व रहा है।

लोकपरम्परा में कहीं-कहीं ‘लमटेरा’ के स्थान पर ‘रमटेरा’ नाम भी प्रचलित है। ऐसी मान्यता है कि ‘ल’ के स्थान पर ‘र’ का प्रयोग होने से यह शब्द ‘रमटेरा’ बन गया और बाद में इसे ‘राम’ को पुकारने अथवा उनका स्मरण करने वाले गीतों के अर्थ में भी ग्रहण किया जाने लगा। इस प्रकार इन गीतों में यात्रा, सामूहिक गायन, लोकआस्था और भक्ति का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

बुन्देली लमटेरा गीतों की परम्परा
बुन्देलखण्ड में लमटेरा गीतों की परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। समय के साथ इन गीतों में शिवभक्ति, रामभक्ति तथा अन्य धार्मिक भावनाओं का समावेश हुआ। प्राचीन लोकपरम्परा में इन्हें भोलेनाथ अर्थात् भगवान शिव की भक्ति से जुड़े गीतों के रूप में भी जाना जाता रहा है। कई गीतों की साखी के अंत में ‘कै बोलो भाई बम भोले’ की टेक लगाई जाती है। इसी कारण इस प्रकार के गीतों को ‘बंबुलिया’ भी कहा जाता है। ‘बंबुलिया’ नाम का सम्बन्ध ‘बम-बम’ के उद्घोष से माना जाता है, जो भगवान शिव के प्रति भक्तिभाव प्रकट करता है।

लमटेरा गीतों का एक अन्य प्रचलित नाम ‘टिप्पे’ भी है। इस नाम की व्याख्या ‘टप्पा’ अथवा ‘टिप्पा’ शब्द से की जाती है। लोकव्युत्पत्ति के अनुसार, यात्रा के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान तक की दूरी तय करते हुए गाए जाने वाले गीत टिप्पे कहलाए। बुन्देलखण्ड के विस्तृत क्षेत्र में स्थानीय बोली, गायन-शैली और धार्मिक परम्पराओं के अनुसार इन गीतों के नाम तथा स्वरूप में विविधता देखने को मिलती है।

लमटेरा गीत का उदाहरण
लमटेरा गीतों में भगवान शिव की महिमा, उनके पारिवारिक स्वरूप और भक्तिभाव की सहज अभिव्यक्ति मिलती है। उदाहरण के लिए—
महादेव बाबा ऐसे जो मिले रेऽऽ,
ऐसे जो मिले रे, जैसे मिल गए महतारी और बाप रे।
महादेव बाबा!
महादेव बाबा बड़े रसिया रे, बड़े रसिया रेऽऽ,
बड़े रसिया रे, बड़े रसिया रे,
माई गौरा से जोरें बैठे गाँठ रे।

इन पंक्तियों में भगवान शिव के प्रति आत्मीयता और श्रद्धा का भाव व्यक्त हुआ है। ‘महतारी और बाप’ जैसे आत्मीय सम्बोधनों के माध्यम से भक्त अपने आराध्य को माता-पिता के समान निकट अनुभव करता है। गीत की टेक और लम्बे स्वरों का प्रयोग सामूहिक गायन को प्रभावशाली बनाता है।

लमटेरा गीतों के छन्द एवं संरचना
लमटेरा गीतों की संरचना में विविधता मिलती है। इनकी लय, मात्रा-विधान, टेक और लटकनिया गायन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं। परम्परागत वर्णनों के आधार पर इनके दो प्रमुख रूपों का उल्लेख किया जाता है।

1- एक चरण वाला लमटेरा
इस प्रकार के गीत में एक ही चरण अथवा मुख्य पंक्ति होती है। इसके गायन में प्रायः यति और मात्रा-विधान का विशेष ध्यान रखा जाता है। कुछ पारम्परिक विवरणों के अनुसार, इसकी मूल रचना में एक खण्ड 16 मात्राओं तथा दूसरा खण्ड 20 मात्राओं का होता है। इस प्रकार मूल चरण 36 मात्राओं का माना जाता है। गायन के दौरान अतिरिक्त स्वर-विस्तार अथवा लयात्मक अंश जुड़ने से इसकी कुल मात्रा-संरचना 52 मात्राओं तक पहुँच सकती है। हालाँकि, वास्तविक मात्रा-विधान गीत और स्थानीय गायन-परम्परा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

2- सखयाऊ लमटेरा
सखयाऊ लमटेरा में एक साखी के साथ ‘लटकनिया’ जुड़ी रहती है। साखी की पहली अर्द्धाली के प्रारम्भिक अंश के बाद ‘रे मोरे प्यारे’ अथवा ‘रे मोरे भइया’ जैसे सम्बोधन जोड़ने की परम्परा मिलती है। लटकनिया में प्रयुक्त मात्राओं की संख्या अलग-अलग हो सकती है।

कुछ गीतों में साखी के बाद ‘कै बोलो भाई बम, कै बोलो भाई बम भोले’ जैसी टेक लगाई जाती है। विशेष रूप से काँवर यात्रा से जुड़े गायन में इस प्रकार की लटकनिया का महत्त्व है। लटकनिया 8,10,11 मात्राओं की हो सकती है। कहीं-कहीं साखी के बाद लटकनिया में ’’कै बोलो भाई बम, कै बोलो भाई बम भोले‘‘ की 11* 15 =26 मात्राओं की पंक्ति होती है। इसकी लय काँवर लेकर चलने वाले भक्तों के कदमों के साथ तालमेल स्थापित करती है। परिणामस्वरूप, यात्रा के दौरान सामूहिक गायन और पदचालन में सहज एकरूपता उत्पन्न होती है।

विषयवस्तु की दृष्टि से लमटेरा गीतों के प्रकार
लमटेरा गीत केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें लोकजीवन, नैतिकता, पौराणिक आख्यान, रहस्यबोध और शृंगार जैसे विविध विषयों का समावेश मिलता है। विषयवस्तु के आधार पर इन्हें निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है।

1- भक्तिपरक गीत: इन गीतों में भगवान शिव, भैरव, नर्मदा, गंगा, राम और कृष्ण आदि के प्रति श्रद्धा तथा भक्ति की अभिव्यक्ति होती है। तीर्थयात्रा और धार्मिक पर्वों के अवसर पर इनका विशेष महत्त्व रहता है।

2- रहस्यपरक गीत: इन गीतों में जीवन, आत्मा, परमात्मा और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़े गूढ़ भाव व्यक्त होते हैं। इनकी अभिव्यक्ति में कबीर की साखियों जैसी रहस्यमयता देखने को मिल सकती है।

3- पौराणिक गीत: इनमें रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक आख्यानों से संबंधित प्रसंगों और पात्रों का उल्लेख मिलता है।

4- नीतिपरक गीत: इन गीतों के माध्यम से नैतिक मूल्यों, सदाचार, व्यवहार-कुशलता और जीवनोपयोगी शिक्षाओं को प्रस्तुत किया जाता है।

5- शृंगारपरक गीत: इन गीतों में प्रेम, सौन्दर्य, अनुराग और मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है।

6- परिवारपरक अथवा गृहस्थजीवन से जुड़े गीत: इनमें पारिवारिक सम्बन्धों, सामाजिक व्यवहार, घरेलू जीवन और मानवीय संवेदनाओं का यथार्थ चित्रण मिलता है।

शैली की दृष्टि से लमटेरा गीतों के प्रकार
लमटेरा गीतों की विशेषता उनकी विषयवस्तु के साथ-साथ उनकी प्रस्तुति-शैली में भी निहित है। गायन की अभिव्यक्ति और कथन-पद्धति के आधार पर इनके विभिन्न रूप दिखाई देते हैं।

1- अभिधात्मक शैली के गीत: इनमें भावों और विचारों को सीधे, सरल तथा स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया जाता है।

2- प्रश्नोत्तर शैली के गीत: इनमें प्रश्न और उत्तर के माध्यम से किसी विषय, विचार अथवा प्रसंग को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।

3- पहेली शैली के गीत: इन गीतों में पहेली के माध्यम से किसी तथ्य अथवा भाव को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त किया जाता है। श्रोता गीत के अर्थ को समझने और उसका उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं।

4- व्यंग्यप्रधान शैली के गीत: इनमें सामाजिक विसंगतियों, मानवीय कमजोरियों और व्यवहारगत विरोधाभासों पर चुटीले ढंग से व्यंग्य किया जाता है। इनके माध्यम से मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी दिया जाता है।

लमटेरा गीतों की विशेषताएँ एवं सांस्कृतिक महत्त्व
लमटेरा गीतों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लम्बी टेर, सहज लय और सामूहिक गायन है। इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि यात्रा को आनंदमय बनाना, धार्मिक भावनाओं को जागृत करना और यात्रियों के बीच सामूहिकता की भावना विकसित करना भी है। लम्बे स्वर में गाए जाने वाले ये गीत दूर तक सुनाई देते हैं और यात्रा कर रहे लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। इनके गायन से यात्रा का श्रम कम अनुभव होता है तथा मार्ग में उत्साह और उमंग बनी रहती है।

लमटेरा गीतों में लौकिक और अलौकिक, दोनों प्रकार के जीवनानुभवों को स्थान मिला है। एक ओर इनमें भक्ति, अध्यात्म और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना दिखाई देती है, तो दूसरी ओर शृंगार, पारिवारिक सम्बन्धों और सामाजिक जीवन की सहज अभिव्यक्ति भी मिलती है। यही विविधता इन्हें बुन्देलखण्ड की महत्त्वपूर्ण लोकगीत परम्परा बनाती है।

प्रातःकाल गाए जाने वाले लमटेरा गीतों में जागरण का विशेष भाव मिलता है। मकर संक्रान्ति जैसे पर्वों पर ‘बेरा भई’ अर्थात् ‘भोर हो गई’ की पुकार लोगों को जागने और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तैयार होने का संदेश देती है। इसकी गूँज लोकजीवन में नई सुबह, नई चेतना और सामूहिक सक्रियता का प्रतीक बन जाती है।

कालभैरव और भैरोंनाथ के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं की यात्राओं में भी ऐसे गीतों का विशेष महत्त्व रहा है। इन गीतों के माध्यम से लोकआस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। धार्मिक विश्वासों के साथ-साथ इनमें क्षेत्रीय भाषा, स्थानीय उच्चारण, लोकलय और सामुदायिक जीवन की स्मृतियाँ भी सुरक्षित रहती हैं।

लमटेरा गीतों की विषयवस्तु भले ही अनेक बार सीमित दिखाई दे, लेकिन उनकी गायन-शैली, लम्बी टेर, प्रभावशाली टेक और सामूहिक प्रस्तुति उन्हें विशिष्ट बनाती है। इनकी सरल भाषा में भी भावों की गहराई और व्यंजना की शक्ति छिपी रहती है। यही कारण है कि लमटेरा गीत बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक चेतना और लोकसंगीत की अमूल्य धरोहर बने हुए हैं।

आज आवश्यकता है कि इन गीतों का संकलन किया जाए, पारम्परिक गायकों के अनुभवों को दर्ज किया जाए तथा नई पीढ़ी को इस लोकविधा से परिचित कराया जाए। लमटेरा गीतों का संरक्षण केवल एक गायन-परम्परा को बचाना नहीं, बल्कि बुन्देलखण्ड की लोकस्मृति, भाषा और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना भी है।

दरस की तौ बेरा भई,
अरे बेरा भई पट खोलौ छबीले भैंरोंलाल हो……दरस की हो…..।
दरस की तौ बेरा भई,
अरे बेरा भई पटखोलौ छबीले भैरोंनाथ हो…..दरस की हो…..।

कालभैरव, भैरोंनाथ, नर्बदा, गंगा, गणेश आदि के प्रति लोकभक्तिभाव का सहज रूप इन गीतों में मिलता है। लोकभक्ति सम्प्रदायविहीन भक्ति है, वह न तो किसी खास देवता की है और न किसी खास जाति, वर्ग या धर्म की। लोकभक्ति के भाव की तीव्रता का अंकन पारिवारिक प्रतीकों से करना लोककवि की प्रतिभा का आभास देता है।

नरबदा माता तो लगै रे,
माता लगै तिरबेनी लगै रे मोरी बैन हो…….नरबदा हो…….।
महादेव बब्बा येसें भेंटोंरे,
येसें भेंटों जैसें भेंटे मताई उर बाप हो…….महादेव बब्बा हो……।

माता, पिता, पुत्रादि के प्रतीक संतों ने लोकगीतों से लिए हैं। साथ ही लोकदर्शन की समझ से ही संत और भक्त कवियों का दर्शन प्रेरित रहा है। लमटेरा गीतों में जिस लोकदर्शन की अभिव्यक्ति हुई है, वह किसी विशेष जाति, वर्ग, सम्प्रदाय का दर्शन नहीं है। वह तो हर आदमी का दर्शन है।

निकर चलौ दै टटिया हो,
दै टटिया धंधे में लगन देव आग हो……निकर चलौ हो……।
बननियाँ बगवा व्यानी हो,
बगवा ब्यानी बो तो सारे बनियन धर-धर खाय हो…..बननियाँ हो….।

बननियाँ माया है, जिसने बाघ रूपी अहंकार को जन्म दिया है और वह सभी मायापतियों को पकड़-पकड़ कर खा रहा है। गाँव के लोग इस अर्थ से परिचित हैं, तभी तो वह लोकमुख में है। मार्ग में जाते स्त्री-पुरुष श्रृंगारिक गीतों में भी रस लेते हैं। भक्तिरस एक तरह से अलौकिक श्रृंगार है। लौकिक से अलौकिक की तरफ जाने की गली काफी पुरानी है। इस युग में वीरता के बाद श्रृंगार को ही स्थान मिला था, इस वजह से इन गीतों में भी श्रृंगार का सुंदर स्वरूप चित्रित किया गया है।

कजरवा तो थोरो दओ रे,
थोरो दओ तोरे ऊसई लगनियाँ हैं नैन रे….. कजरवा हो …….।
मिलन खों बहयाँ फरकें रे,
बइयाँ फरकें दरस खों तरस रये दोई नैन हो….. मिलन खों हो……।
बरस जा दो बुँदियाँ रे,
दो बुँदियाँ मोरे कंता घरईं रै जायॅ हो……. बरस जा हो…….. ।

सभी गीत अपने भीतर रस की गगरिया रखे हुए है जो धीरे-धीरे रिसती रहती है और मन को भिगोती रहती है। लमटेरा की विशेषता है लोकजीवन का चित्रण। वह जीवन, जिसकी कसौटी लोकत्व है। Bundelkhand ka Lamtera गीतों में देवत्व को भी मानवत्व प्रदान किया गया है और मानवत्व को उसके यथार्थपरक संबंधों से जोड़ा गया है आदि देवता गणेश गजरे के लिए मचलते हैं। ठीक उसी तरह, जिस तरह एक छोटा बालक मेले में माला पहनने के लिए मचलता है और माली या मालिन के पास खड़ा हो जाता है।
गणेश देव गजरा खों बिरजे, अरे बिरजे बे तौ ठाँड़े मलिनियाँ के दोर हो…….।

आधुनिक कथासाहित्य में तीसरे आदमी को काफी महत्व मिला है, लेकिन अंचल के परिवार में तीसरी नारी ननद की चर्चा बेजोड़ है। उसके बिना तो सारा लोकसाहित्य सूना है। भौजी ननद से तंग आकर कितनी तीखी चोट करती है, इसका पता लमटेरा के दो उदाहरणों से चलता है।

ननद जू बड़ी बिषकरमा हो,
बिषकरमा री बिष बाँदे चुनरिया के छोर रे….ननद जू हो…..।
ननद मोरी बटुआ सी,
बटुआ सी ननदोई हैं कोलू कैसे बैल हो……ननद मोरी हो……।

ननद और भौजी की नोंक-झोंक, भौजी और देवर की हँसी-खुशी तथा ब्याहता और सौत का ईष्या-द्वेष लोकसंस्कृति के घरेलू यथार्थ हैं, जो इन गीतों को वास्तविकता के बहुत नजदीक ला देते हैं। इस आधार पर लमटेरा गीत आदर्श और यथार्थ दोनों की मिली-जुली अभिव्यक्ति के गीत ठहरते हैं।

शिल्प की दृष्टि से इन गीतों की विशेषता उनकी व्यंजना है। केवल एक पंक्ति का एक गीत और इतनी अर्थवत्ता। रस जैसे छलका पड़ता हो। उसमें भाव या विचार का एक टुकड़ा बैठ जाता है और हृदय या बुद्धि को चमत्कृत कर देता है। लमटेरे लोकजीवन की यात्रा में जहाँ तन के श्रमपरिहार के साधन है, वहाँ मन के उल्लास के माध्यम भी हैं।

इसे भी देखिए:बुन्देलखण्ड के लोकनृत्य

संदर्भ-
बुंदेली लोक साहित्य परंपरा और इतिहास – डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुंदेली लोक संस्कृति और साहित्य – डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुन्देलखंड की संस्कृति और साहित्य – श्री राम चरण हयारण “मित्र”
बुन्देलखंड दर्शन – मोतीलाल त्रिपाठी “अशांत”
बुंदेली लोक काव्य – डॉ. बलभद्र तिवारी
बुंदेली काव्य परंपरा – डॉ. बलभद्र तिवारी
बुन्देली का भाषाशास्त्रीय अध्ययन -रामेश्वर प्रसाद अग्रवाल