बुन्देलखण्ड की लोकसंस्कृति में लोकदेवताओं का विशेष महत्त्व है। यहाँ के लोकदेवता जनमानस की आस्था, लोकविश्वास, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक माने जाते हैं। बुन्देलखण्ड में प्रचलित लोकदेवताओं की मान्यताएँ स्थानीय जनजीवन, ग्रामीण परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक लोकगाथाओं से जुड़ी हुई हैं। मैकासुर बुन्देलखण्ड की लोकदेव परंपरा से संबंधित एक नाम है, जिसके परिचय और महत्त्व को स्थानीय लोकविश्वासों तथा प्रचलित कथाओं के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बुन्देलखण्ड में लोकदेवताओं के प्रति श्रद्धा विभिन्न लोकाचारों, पूजा-पद्धतियों, लोकगीतों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। इन परंपराओं में स्थानीय समुदायों की मान्यताएँ, जीवन के अनुभव और सांस्कृतिक विरासत प्रतिबिंबित होती हैं। मैकासुर से संबंधित लोकमान्यताओं का अध्ययन बुन्देलखण्ड की लोकधार्मिक परंपराओं और क्षेत्रीय लोकसंस्कृति को समझने की दिशा में उपयोगी हो सकता है।
मैकासुर Maikasur को बुंदेलखंड क्षेत्र में पशुरक्षक देवता के रूप मे मान्यता प्राप्त है। इसी रूप में उनकी पूजा भी की जाती है। यद्यपि इनके बारे में किसी प्रकार का एतिहासिक वर्णन प्राप्त नहीं होता है फ़िर भी जनमानस की आस्था के अनुसार प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इनकी पूजा की जाती है।
इस पूजा में विशेष रूप से मैकासुर से पशुओं की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। इनके पूजा का स्थान एक चबूतरे पर ऊँचे से टीले पर कंगूरेदार होता है, जहाँ पूजा के समय प्रसाद तथा सफ़ेद रंग की ध्वजा(झंडा) चढाई जाती है। इनके प्रसाद को लेकर मान्यता है कि उसे वहीं समाप्त करना होता है, प्रसाद को घर ले जाने को भी नहीं मिलता है। मान्यता है कि मैकासुर के पूजन के बाद लोगों के जानवर, पशु सुरक्षित रहते हैं।
