Tomar Kal Men Lok Devta तोमर-काल में लोक देवता

272
Tomar Kal Men Lok Devta

ग्वालियर के तोमर नरेशों के संस्कृति और कला के प्रति अत्यधिक प्रेम के कारण ग्वालियर सांस्कृतिक केन्द्र बना और उसने तत्कालीन युग – चेतना को अपने में आत्मसात् कर इस अंचल को जो समृद्धि प्रदान की, Tomar Kal Men Lok Devta -लोकदेवत्व की स्थापना हुई , वह उस संक्रांति के युग में सार्थक सिद्ध हुई ।

15वीं – 16वीं शती में तत्कालीन लोकधर्म और लोकदेवत्व भी आवश्यकतानुसार बदला । कविवर विष्णुदास ने अपने प्रबंधों- ‘रामायणी कथा’ और ‘महाभारत’ (1835 ई.) में राम और कृष्ण को सर्वप्रथम लोक के सामने प्रस्तुत किया और उन्हें लोकदेवत्व की कलम से चित्रित कर अपने कवि-कर्म का निर्वाह किया । छिताईचरित में गणपति, सरस्वती, गंगा, विष्णु राम आदि के साथ शंकर को अधिक महत्त्व दिया गया है । उस युग को भी संहारकर्ता शंकर और कल्याणकारी शिव की जरूरत थी, अतएव उन्हें देवों का देव कहकर सम्मानित  किया गया। 

राजपाट लछमी जे असेसू । होइ सकल जो फुरइ महेसू ।।
निहचइ जीउ लीजइ मानी । शंकर आहि परम पद जानी ।।
मंत्री कहइ न जानहि भेउ । यह शंकर देवन्ह कौ देउ ।।
यह निद्रा तँ छाँडि बहोरी | दीजइ कर्म आपने खोरी ।।

इस समय शिव के साथ ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं कोर बिना किसी साम्प्रदायिक भावना के महत्त्व दिया गया । बैजू बावरा, तानसेन आदि के संगीतपरक पदों में अनेक देवों की समन्वयकारी अर्चना से एक ऐसा शक्तिपुंज खड़ा किया गया, जो आक्रमणकारी से टक्कर ले सके । इस प्रकार लोकदेवों में एकता और शक्ति के विधायन का कार्य कवियों और साहित्यकारों ने किया था ।

संदर्भ-
बुंदेलखंड दर्शन- मोतीलाल त्रिपाठी ‘अशांत’
बुंदेलखंड की संस्कृति और साहित्य- रामचरण हरण ‘मित्र’
बुंदेली लोक साहित्य परंपरा और इतिहास- नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुंदेली संस्कृति और साहित्य- नर्मदा प्रसाद गुप्त

बघेलखंड की लोक कलाएं