झांझी/ झिंझिया- बुन्देली लोक पर्व

बुन्देलखण्ड की लोकसंस्कृति में झांझी या झिंझिया बालिकाओं का एक अनूठा लोक पर्व है। यह पर्व लोकगीत, नृत्य, हस्तकला और बालिकाओं की रचनात्मक प्रतिभा का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार लड़कों की टोली में टेसू प्रमुख होता है, उसी प्रकार लड़कियों की टोली में झांझी या झिंझिया का विशेष महत्त्व होता है। यह परंपरा बच्चों के सामूहिक मनोरंजन और लोककलाओं के संरक्षण से जुड़ी हुई है।

झांझी या झिंझिया की बनावट
झिंझिया मिट्टी की एक छोटी मटकी होती है। इसमें कील की सहायता से अनेक छेद करके सुंदर आकृतियाँ और डिजाइन बनाए जाते हैं। मटकी में थोड़ी रेत भरकर उसके भीतर दीपक रखा जाता है। रात के अँधेरे में दीपक का प्रकाश मटकी के छिद्रों से छनकर बाहर निकलता है, जिससे झिंझिया अत्यंत आकर्षक दिखाई देती है। छिद्रों से बाहर आती प्रकाश की किरणें इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती हैं।

घर-घर घूमने की परंपरा
बुन्देलखण्ड में लड़कियाँ अपनी-अपनी झांझी या झिंझिया को भगौनी में रखकर कपड़े से ढक लेती हैं और टोली बनाकर घर-घर जाती हैं। टेसू लेकर चलने वाले लड़के जहाँ घर के दरवाजे पर रुकते हैं, वहीं झिंझिया लेकर चलने वाली लड़कियाँ घर के भीतर आँगन तक पहुँचती हैं।

आँगन में लड़कियाँ एक घेरा बनाकर बैठ जाती हैं। इसके बाद एक-एक लड़की क्रम से घेरे के मध्य आती है और अपनी झिंझिया लेकर नृत्य करती है। अन्य लड़कियाँ सामूहिक रूप से लोकगीत गाती हैं। जब सभी लड़कियाँ एक साथ नृत्य करती हैं, तब दीपकों की रोशनी, गीतों की मधुर ध्वनि और नृत्य की लय से वातावरण अत्यंत मनोहारी हो जाता है।

झांझी के गीत और सामूहिक नृत्य
झांझी या झिंझिया के गीत बुन्देली लोकगीत परंपरा का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इन गीतों में बाल-सुलभ उल्लास, सामूहिकता और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। लड़कियाँ गीत गाते हुए नृत्य करती हैं और एक-दूसरे की सहभागिता से इस लोकपर्व को जीवंत बनाती हैं।

इस परंपरा में प्रत्येक बालिका को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। गीत और नृत्य के माध्यम से वे अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होती हैं और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में योगदान देती हैं।

सांझी और झिंझिया की कलात्मक परंपरा
क्वाँर माह के पितृपक्ष के दौरान बुन्देलखण्ड की लोकपरंपराओं में सांझी बनाने की प्रथा का भी विशेष उल्लेख मिलता है। सामान्यतः पितृपक्ष को अनेक शुभ कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है, लेकिन लोककला और बाल-संस्कृति की दृष्टि से यह समय विशेष महत्त्व रखता है।

इस परंपरा में छोटी-छोटी बालिकाएँ प्रत्येक संध्या को गोबर, रंग-बिरंगे फूलों और चमकीली पन्नियों के टुकड़ों की सहायता से दीवार पर सांझी के विविध रूपाकार बनाती हैं। अगली सुबह इन आकृतियों को मिटा दिया जाता है और शाम को नए रूप बनाए जाते हैं। इस प्रकार प्रतिदिन सृजन और पुनः सृजन का क्रम चलता रहता है।

सांझी की यह कला बालिकाओं की कल्पनाशीलता, सौंदर्यबोध और रचनात्मकता को अभिव्यक्त करती है। मिट्टी, गोबर, फूल और रंगीन सजावटी सामग्री जैसी स्थानीय वस्तुओं का उपयोग ग्रामीण जीवन और प्रकृति के साथ उनके सहज संबंध को भी दर्शाता है।

विभिन्न क्षेत्रों में सांझी की परंपरा
सांझी बनाने की परंपरा स्थानीय विशेषताओं के साथ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा और अन्य क्षेत्रों में भी प्रचलित रही है। इन क्षेत्रों में इसकी आकृतियों, सजावट की सामग्री और रीति-रिवाजों में अंतर देखने को मिलता है। ग्वालियर में सांझी बनाने की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय मानी जाती है।

इस प्रकार सांझी और झिंझिया से जुड़ी परंपराएँ विभिन्न क्षेत्रों की लोककलाओं के बीच सांस्कृतिक समानता और स्थानीय विविधता, दोनों को सामने लाती हैं।

सांस्कृतिक महत्त्व
झांझी/झिंझिया का लोकपर्व केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह बालिकाओं की रचनात्मक प्रतिभा, सामूहिक जीवन और सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम भी है। इसके प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष हैं—

लोकगीतों का संरक्षण: पारंपरिक गीतों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना।

लोकनृत्य की परंपरा: सामूहिक नृत्य के माध्यम से लोकजीवन की लय और उल्लास को अभिव्यक्त करना।

हस्तकला का विकास: मिट्टी की मटकी में छिद्र करके सुंदर डिजाइन बनाना और सांझी की आकृतियाँ रचना।

सामाजिक सहभागिता: टोली बनाकर घर-घर जाना और परिवारों के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव स्थापित करना।

बाल-सुलभ रचनात्मकता: बच्चों को अपनी कल्पना, कला और कौशल प्रदर्शित करने का अवसर देना।

झांझी/झिंझिया बुन्देलखण्ड की समृद्ध लोकपरंपरा और बालिकाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर प्रतीक है। मिट्टी की छोटी मटकी में जलता दीपक, छिद्रों से छनकर निकलता प्रकाश, सामूहिक लोकगीत और गोल घेरे में किया जाने वाला नृत्य इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं। वहीं सांझी बनाने की परंपरा बालिकाओं की कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को उजागर करती है।

इन लोकपरंपराओं का संरक्षण बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोककलाओं और पारंपरिक जीवन-मूल्यों से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

सांझी से सम्बन्धित किवदन्ती और गीत
बहुत साल पहले किसी गांव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था। परिवार में लगभग सत्तर साठ व्यक्ति थे जो सभी प्रकार से सम्पन्न थे। इनमें से छोटे भाई की पत्नी मर चुकी थी, उसे बड़े भाइयों की पत्नियां बहुत परेशान करती थी इससे दुखी होकर वह अपनी पुत्री को लेकर घर छोड़ कर दूसरे गांव चला गया यह गांव जंगल के किनारे एक सुन्दर गांव था। उस जंगल में एक राक्षस रहता था।

ब्राह्मण की रुपवान कन्या जब एक दिन पानी भरने गई तब उस राक्षस ने उसे देख लिया और उस पर मोहित हो गया। उसने लड़की से उसका परिचय लिया और उसके पिता से मिलने की इच्छा प्रकट की तब लड़की ने कहा कि उसके पिता शाम के समय घर मिलते है। राक्षस शाम को ब्राह्मण बहुत घबराया उसने सोचा यह राक्षस मना करने पर मानने वाला नहीं इससे उसने राक्षस से कहा कि विवाह तो हो जायेगा। परन्तु कुछ रस्में पूरी करनी पड़ेगी इसलिये कुछ दिन का समय लगेगा।

इस बीच ब्राह्मण ने अपने परिवार के लोगों को सहायता के लिये बुलाने का पत्र लिख दिया। क्वांर माह के यह सोलह दिन सोलह श्राद्ध के दिन माने जाते है। और इन दिनों ब्राह्मण की लड़की जो खेल गोबर की थपलियों से खेली वह सांझी या चन्दा तरैयां कहलाया और तभी से सांझी खेलने की परम्परा का आरंभ हुआ। सोलह दिन बीतने पर राक्षस आया परन्तु ब्राह्मण के परिवार वाले नहीं पहुंच पाये इसलिये उसने फिर बहाना कि अब उसकी लड़की नौ दीन मिट्टी के गौर बनाकर खेलेगी। राक्षस नौ दिन बाद फिर वापिस आने का कह कर चला गया।

तभी से यह नौ दिन नौरता कहलाये और इन दिनों सुअटा खेलने की प्रथा शुरु हुई। नौ दिन भी खत्म हो गये पर ब्राह्मण ने उससे कहा अब केवल आखिरी रात रह गई है। अब पांच दिन  तुम और मेरी बेटी घर घर भीख मांगोगे तब शरद पूर्णिमा के दीन तुम्हारी शादी हो सकेगी, राक्षस इस बात के लिये भी मान गया और तभी से दशहरे से पूर्णिमा तक उस राक्षस के नाम पर टेसू और ब्राह्मण की लड़की पर झांझी मांगने की प्रथा का आरंभ हुआ।

इस प्रकार जब भीख मांगते पांच दिन बीत गये और ब्राह्मण के परिवार के लोग नहीं आये तो ब्राह्मण निराश हो गया और उसे अपनी पुत्री का विवाह राक्षस से करने के अलावा कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया तो शरद पूर्णिमा के दिन उसने विवाह निशिचत कर दिया। लेकिन अभी विवाह के साढ़े तीन फेरे ही पड़े थे कि ब्राह्मण के परिवार के लोग आ गये और उन्होने उस राक्षस को मार डाला।

चूंकि उनकी लड़की का आधा विवाह राक्षस से हो चुका था इसलिये उसे भ्रष्ट मान कर उन्होने उसे भी मार डाला इस लिये टेसू और झांझी/झिंझिया का पूरा विवाह नहीं होने दिया जाता है। उन्हें बीच में फोड़ दिया जाता है। ब्राह्मण के भाइयों ने सोचा न  उनका छोटा भाई पर छोड़ कर भागता और न हीं उनके कुल को इस प्रकार दाग लगता इसलिये सारी समस्या का कारण वही है और उन्होने उस ब्राह्मण को भी मार डाला। इसीलिये नौरता में मिट्टी के गौर बनाकर खेला जाने वाला सुआटा टेसू के विवाह के बाद उस ब्राह्मण पिता के प्रतीक सुअटा के रुप में फोड़ दिया जाता है। 

सांझी तेरे फूल
पचासी तेरे डोढ़ा
मोरे भैया गोरे
बुन्देल भैया गोरे
भइयाजी की पीढरी
बेलना अनबेली
भाभी जी के नैन
क झकझोरे
भाभी की गोद भतीजो सोके

 
मेरी सांझी रानी
कुम्हार की मौड़ी कानी
भर लेआ बेटा पानी

 
मेरी सांझी सोवे पलंग पे
ओर की सांझी लोटे घूरे पै

 
एक हल्दी गांठ गठीली
शीला बाई बहुत हठीली

 
जेवर कांटा जेवर कांटा
जै महुआ जिन काटो
जै महुआ मेरे बाबुल लगा गए
इन तन खेलन जाती
जे महुआ जिन कांटा लागें
घरे जा तो अम्मा लड़ेगी

 
सांझी मेरे फूल पचासी तेरे डोरा
जतन निकालो सांझी बाई को डोला
इनमें और इनमें कोन से भइया गोरे
इनमें में और जिनमें हेमलता बाई को डोला
सांझी तेरे …………………………..
गोरे भाइया, गोरे गुलेल कन्ठी जोड़े
सांझी ……………………………..
जतन निकला मना
भाई को डोला, बबली बाई का डोला

 
माटी को मटेलना पिरोजना
गेडतिया तेरा खेत
खेलन बेटी खेलत भययो बबुला के राजंगी
जब डिर जा सासरे पिरोजन
सूखे कुरकुटा गिर गये पिरोजन
सूखे कुरकुटा देय
नौन चबैना देय
नौन चबैना बगर गयो
गिन गिन टोला देय पिरोजना

 बाबुल दूर जीड़री
जिन करो कौन रखावन जाय
बेटी तुम्ही हमारे लाडली
तुम्ही रखावन जाय
बाबुल इतते जातिउ घाम लगत है
बितते लगत है प्यासं
बैठ वहीं खुदा द कुआ बावड़ीं
वहीं लगवा द बाग
 
मामुलिया – बुन्देली लोक पर्व 

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