भारतीय संस्कृति में वास्तुकला का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। प्राचीन भारतीय स्थापत्य के विकास में गुफा-मंदिरों, चैत्यगृहों, विहारों, स्तूपों और स्वतंत्र रूप से निर्मित मंदिरों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इन स्थापत्य रूपों के माध्यम से तत्कालीन समाज की धार्मिक मान्यताओं, आध्यात्मिक विचारों, तकनीकी दक्षता, कलात्मक अभिरुचि और सामाजिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
भारत में गुफा-वास्तुकला का विकास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कलाकारों और शिल्पियों ने पहाड़ों तथा कठोर चट्टानों को काटकर ऐसे धार्मिक स्थल निर्मित किए, जिनमें प्रार्थना, ध्यान, उपासना और भिक्षुओं के निवास की व्यवस्था की गई थी। इन गुफाओं में स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
बिहार की बराबर पहाड़ियों से लेकर महाराष्ट्र की अजंता, कार्ले, भाजा, नासिक और कन्हेरी की गुफाओं तक तथा ओडिशा की उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं से लेकर एलोरा और एलीफैंटा के गुफा-मंदिरों तक भारतीय शैलकृत वास्तुकला का व्यापक विकास हुआ। दक्षिण भारत के मामल्लपुरम और कर्नाटक के बादामी में भी चट्टानों को काटकर गुफा-मंदिर तथा विशाल शिल्प-पटल बनाए गए।
इन गुफाओं की योजना, मुखभाग, स्तंभ, छत, मंडप, गर्भगृह, मूर्तियों और अलंकरणों में स्थानीय भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। फिर भी चट्टान को काटकर धार्मिक स्थापत्य निर्मित करने की मूल तकनीक इन सभी केंद्रों को एक व्यापक भारतीय परंपरा से जोड़ती है।
भारतीय वास्तुकला के इतिहास में गुफा-मंदिरों का विशेष महत्त्व इसलिए भी है कि इनके अध्ययन से लकड़ी और अन्य नष्ट होने वाली सामग्रियों से निर्मित प्राचीन भवनों के कुछ रूपों का अनुमान लगाया जा सकता है। कई प्रारंभिक शैलकृत गुफाओं में लकड़ी के भवनों जैसी छतों, बीमों और प्रवेशद्वारों की आकृतियाँ पत्थर में उत्कीर्ण की गई हैं।
गुफा, चैत्य और विहार का अर्थ
प्राचीन भारतीय स्थापत्य को समझने के लिए गुफा, चैत्य और विहार के अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है।
गुफा: सामान्य अर्थ में पहाड़ या चट्टान के भीतर स्थित प्राकृतिक अथवा कृत्रिम कक्ष को गुफा कहा जाता है। भारतीय स्थापत्य के संदर्भ में गुफा-मंदिर प्रायः वे धार्मिक संरचनाएँ हैं जिन्हें चट्टान को काटकर बनाया गया था। इनमें पूजा, ध्यान, निवास तथा धार्मिक गतिविधियों की व्यवस्था होती थी।
चैत्य: बौद्ध परंपरा में चैत्य का संबंध पवित्र स्थल अथवा पूजनीय स्मारक से है। चैत्यगृह वह धार्मिक कक्ष होता था जहाँ श्रद्धालु उपासना करते थे। अनेक प्राचीन चैत्यगृहों के अंतिम भाग में स्तूप स्थापित होता था, जिसके चारों ओर प्रदक्षिणा की व्यवस्था रहती थी।
विहार: विहार बौद्ध भिक्षुओं के निवास, अध्ययन, ध्यान और सामूहिक जीवन का स्थान था। प्रारंभिक विहारों में साधारण कक्ष होते थे, जबकि बाद की गुफाओं में मध्यवर्ती मंडप के चारों ओर अनेक कोठरियाँ बनाई गईं। इनमें भिक्षुओं के रहने के लिए छोटे कक्ष तथा कभी-कभी पूजा के लिए अलग गर्भगृह भी होता था।
चैत्यगृह और विहार का उद्देश्य अलग-अलग होने पर भी अनेक गुफा-समूहों में दोनों प्रकार की संरचनाएँ साथ-साथ मिलती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन बौद्ध स्थापत्य में धार्मिक उपासना और मठीय जीवन को एक ही परिसर में व्यवस्थित किया जाता था।
भारत में गुफा-वास्तुकला का आरंभ
भारत में शैलकृत वास्तुकला के सबसे महत्त्वपूर्ण आरंभिक उदाहरण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मौर्यकाल से प्राप्त होते हैं। बिहार के गया क्षेत्र के निकट स्थित बराबर पहाड़ियों की गुफाएँ इस परंपरा की प्राचीन और उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं।
इन गुफाओं का निर्माण कठोर ग्रेनाइट चट्टान को काटकर किया गया था। भीतर की दीवारों और छतों पर अत्यंत चिकनी पॉलिश की गई है। इस चमकदार सतह से मौर्यकालीन शिल्पियों की तकनीकी दक्षता का परिचय मिलता है।
प्रारंभिक गुफाओं में अपेक्षाकृत सरल कक्ष दिखाई देते हैं। आगे चलकर चैत्यगृहों में लंबे आयताकार मंडप, अर्धवृत्ताकार पिछला भाग, स्तंभों की पंक्तियाँ और स्तूप की व्यवस्था विकसित हुई। विहारों में केंद्रीय कक्ष तथा उसके चारों ओर बने छोटे आवासीय कक्ष प्रमुख हो गए।
समय के साथ गुफाओं के मुखभाग पर भी विशेष ध्यान दिया जाने लगा। प्रवेशद्वारों पर सजावटी आकृतियाँ, स्तंभ, तोरण, मूर्तियाँ और अलंकरण बनाए जाने लगे। महायान बौद्ध धर्म के विकास के साथ अनेक गुफाओं में बुद्ध और बोधिसत्त्वों की प्रतिमाएँ भी स्थापित की गईं।
इस प्रकार भारतीय गुफा-वास्तुकला का विकास साधारण शैलकृत कक्षों से आरंभ होकर विस्तृत धार्मिक परिसरों तक पहुँचा।
बराबर पहाड़ियों की गुफाएँ
बिहार के जहानाबाद क्षेत्र में स्थित बराबर पहाड़ियाँ भारतीय शैलकृत वास्तुकला के आरंभिक इतिहास में विशेष स्थान रखती हैं। यहाँ की गुफाएँ मौर्यकालीन शिल्प-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। सम्राट अशोक ने इनमें से कुछ गुफाएँ आजीविक संप्रदाय के अनुयायियों को समर्पित की थीं।
आजीविक एक प्राचीन धार्मिक संप्रदाय था, जिसका अस्तित्व बौद्ध और जैन परंपराओं के समकालीन था। बराबर की गुफाओं से यह प्रमाणित होता है कि मौर्यकालीन राजकीय संरक्षण केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं था।
(A) सुदामा गुफा
सुदामा गुफा बराबर समूह की प्रमुख गुफाओं में से एक है। इसके भीतर एक आयताकार कक्ष और उसके पीछे एक गोलाकार अथवा गुंबदाकार कक्ष मिलता है। इसकी दीवारों और छत पर की गई चमकदार पॉलिश उल्लेखनीय है।
गुफा के भीतर ध्वनि की प्रतिध्वनि भी विशेष रूप से अनुभव की जा सकती है। इसकी चिकनी सतह और स्पष्ट ज्यामितीय योजना इसे प्राचीन भारतीय वास्तुकला की अनूठी उपलब्धि बनाती है।
इसके अभिलेख के अनुसार, सम्राट अशोक ने अपने राज्यकाल के बारहवें वर्ष में इस गुफा को आजीविकों को समर्पित किया था। यह अभिलेख गुफा के ऐतिहासिक महत्त्व को स्थापित करने में सहायक है।
(B) कर्ण चौपड़ गुफा
कर्ण चौपड़ भी बराबर पहाड़ियों की एक महत्त्वपूर्ण गुफा है। इसका कक्ष अपेक्षाकृत सरल है और इसकी भीतरी सतह पर मौर्यकालीन पॉलिश दिखाई देती है। इसके अभिलेख से अशोक के उन्नीसवें राज्य वर्ष में आजीविकों को गुफा समर्पित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह गुफा बताती है कि मौर्यकालीन शिल्पी कठिन चट्टान में नियमित आकार के कक्ष बनाने और उनकी दीवारों को अत्यंत चिकना करने में सक्षम थे।
(C) लोमस ऋषि गुफा
लोमस ऋषि गुफा अपने सुंदर प्रवेशद्वार के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके मुखभाग पर घोड़े की नाल जैसी आकृति वाला विशाल प्रवेश-विन्यास है, जिसके ऊपर हाथियों की पंक्ति उत्कीर्ण की गई है। यह सजावट लकड़ी के पुराने स्थापत्य रूपों से प्रेरित मानी जाती है।
लोमस ऋषि गुफा का मुखभाग भारतीय वास्तुकला में सजावटी प्रवेशद्वारों के विकास का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यद्यपि गुफा का आंतरिक भाग पूरी तरह पूर्ण नहीं है, फिर भी उसका प्रवेशद्वार अपनी कलात्मक योजना के कारण विशिष्ट है।
इस गुफा पर अशोक का समर्पण-अभिलेख नहीं मिला है, इसलिए इसके निर्माण और समर्पण के विषय में सुदामा गुफा जैसी निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
(D) विश्वकर्मा गुफा
बराबर समूह में विश्वकर्मा गुफा भी उल्लेखनीय है। इसका विन्यास अपेक्षाकृत सरल है और इसमें चट्टान काटकर कक्ष बनाए गए हैं। यह गुफा मौर्यकालीन शैलकृत वास्तुकला की तकनीकी परंपरा को समझने में सहायक है।
बराबर की गुफाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं—कठोर ग्रेनाइट में खुदाई, चिकनी पॉलिश, सरल आंतरिक योजना और लकड़ी के स्थापत्य से प्रेरित प्रवेश-विन्यास। इन गुफाओं ने आगे की शैलकृत वास्तुकला के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाएँ
बराबर पहाड़ियों के निकट स्थित नागार्जुनी पहाड़ियों में भी प्राचीन गुफाएँ प्राप्त हुई हैं। इनका निर्माण सम्राट अशोक के पौत्र दशरथ के समय से संबंधित है। दशरथ ने आजीविक संप्रदाय के अनुयायियों को गुफाएँ समर्पित की थीं।
नागार्जुनी समूह की प्रमुख गुफाओं में गोपी गुफा, वडथिका गुफा और वापियका गुफा का उल्लेख किया जाता है। इन गुफाओं के भीतर लंबाकार कक्ष और चिकनी सतहें दिखाई देती हैं।
नागार्जुनी की गुफाएँ इस तथ्य का प्रमाण हैं कि मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भी शैलकृत वास्तुकला की तकनीक और धार्मिक संरक्षण की परंपरा जारी रही। इनके निर्माण में बराबर समूह की वास्तु-परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है।
बराबर और नागार्जुनी की गुफाओं का संयुक्त अध्ययन प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता, राजकीय संरक्षण और शिल्प-कौशल की जानकारी देता है।
भाजा की गुफाएँ
महाराष्ट्र के पुणे जिले के निकट स्थित भाजा की गुफाएँ प्रारंभिक बौद्ध शैलकृत वास्तुकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। इनका विकास सामान्यतः दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास की प्रारंभिक बौद्ध गुफा-परंपरा से जोड़ा जाता है।
भाजा के प्रमुख चैत्यगृह में एक लंबा कक्ष है, जिसके पिछले भाग में स्तूप स्थित है। छत का आकार घुमावदार है और भीतर स्तंभों की पंक्तियाँ दिखाई देती हैं। इन स्तंभों की व्यवस्था से मुख्य कक्ष और प्रदक्षिणा-पथ के बीच स्पष्ट विभाजन बनता है।
इस चैत्यगृह की छत में लकड़ी के स्थापत्य की परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है। प्रारंभिक शैलकृत वास्तुकारों ने पत्थर में ऐसे रूप निर्मित किए जो लकड़ी से बने धार्मिक भवनों की स्मृति कराते हैं।
भाजा की गुफाओं में भिक्षुओं के निवास के लिए छोटे कक्ष भी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पूजा और मठीय जीवन के लिए अलग-अलग स्थानों की व्यवस्था की जाती थी।
भाजा की गुफाएँ इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें शैलकृत स्थापत्य के साथ मूर्तिकला और सजावटी रूपांकनों का प्रारंभिक विकास दिखाई देता है।
कार्ले का चैत्यगृह
महाराष्ट्र के पुणे जिले के निकट कार्ले का चैत्यगृह प्राचीन भारतीय बौद्ध वास्तुकला की श्रेष्ठ उपलब्धियों में गिना जाता है। इसका निर्माण प्रारंभिक शताब्दियों ईसा पूर्व से ईस्वी की आरंभिक शताब्दियों के बीच विकसित शैलकृत परंपरा से संबंधित है।
कार्ले का चैत्यगृह आकार, योजना और अलंकरण की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली है। इसका मुख्य कक्ष लंबा है और पीछे का भाग अर्धवृत्ताकार है। भीतर स्तंभों की पंक्तियाँ हैं, जो मुख्य मार्ग और स्तूप के चारों ओर बने प्रदक्षिणा-पथ को अलग करती हैं।
चैत्यगृह के अंतिम भाग में स्तूप स्थित है। स्तूप बौद्ध उपासना का महत्त्वपूर्ण प्रतीक था। श्रद्धालु स्तूप के चारों ओर दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा करते थे। इस प्रकार वास्तु-योजना धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई गई थी।
कार्ले के चैत्यगृह का प्रवेशद्वार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका विशाल मुखभाग, घुमावदार छत और सजावटी तत्व प्रारंभिक भारतीय स्थापत्य की विकसित अवस्था को दर्शाते हैं। यहाँ पत्थर में लकड़ी के स्थापत्य की परंपरा का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।
चैत्यगृह के भीतर और बाहर उत्कीर्ण अभिलेखों से इसके निर्माण में व्यापारियों, दानदाताओं और अन्य समर्थकों की भूमिका का पता चलता है। पश्चिमी भारत के व्यापारिक मार्गों के निकट स्थित होने के कारण इस क्षेत्र के बौद्ध स्मारकों को व्यापारिक समुदायों से संरक्षण मिला।
कार्ले की गुफा यह दर्शाती है कि प्राचीन भारत में धार्मिक वास्तुकला का विकास केवल राजाओं के संरक्षण से नहीं, बल्कि व्यापारियों, स्थानीय समुदायों और अन्य दानदाताओं के सहयोग से भी हुआ।
नासिक, बेडसा, जुन्नार और कन्हेरी की गुफाएँ
महाराष्ट्र में नासिक, बेडसा, जुन्नार और कन्हेरी की गुफाएँ बौद्ध स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
(A) नासिक की गुफाएँ
नासिक की गुफाओं में चैत्यगृहों और विहारों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। यहाँ के अभिलेखों से सातवाहन शासकों, स्थानीय अधिकारियों, व्यापारियों तथा दानदाताओं के धार्मिक संरक्षण की जानकारी मिलती है।
नासिक की गुफाओं में स्तंभों, प्रवेशद्वारों और कक्षों का विन्यास विकसित रूप में दिखाई देता है। कुछ विहारों में विस्तृत मंडप और छोटे-छोटे आवासीय कक्ष हैं, जो भिक्षुओं के सामूहिक जीवन के लिए बनाए गए थे।
(B) बेडसा की गुफाएँ
बेडसा की गुफाओं में चैत्यगृह और विहार दोनों प्रकार की संरचनाएँ मिलती हैं। इनके चैत्यगृह में स्तंभों की नियमित व्यवस्था, घुमावदार छत और स्तूप का संयोजन देखने को मिलता है। मुखभाग पर अलंकरण तथा वास्तु-रूपों की स्पष्ट योजना इसकी विशेषताएँ हैं।
(C) जुन्नार की गुफाएँ
जुन्नार क्षेत्र में बड़ी संख्या में बौद्ध गुफाएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें कई विहार तथा कुछ चैत्यगृह हैं। ये गुफाएँ बताती हैं कि पश्चिमी भारत में बौद्ध मठीय जीवन अनेक छोटे-बड़े केंद्रों में फैला हुआ था।
(D) कन्हेरी की गुफाएँ
मुंबई के निकट संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित कन्हेरी की गुफाएँ लंबे समय तक विकसित हुए बौद्ध मठीय परिसर का उदाहरण हैं। यहाँ अनेक गुफाएँ, जलाशय, जल-संग्रह की व्यवस्थाएँ, स्तूप और धार्मिक कक्ष मिलते हैं।
कन्हेरी की गुफाओं का विशेष महत्त्व जल-प्रबंधन और मठीय जीवन की व्यवस्था में भी है। चट्टानों में काटकर बनाए गए जलाशय वर्षा के जल को संचित करने में सहायक थे। इससे पता चलता है कि शैलकृत स्थापत्य में केवल धार्मिक आवश्यकताओं ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की व्यावहारिक जरूरतों का भी ध्यान रखा जाता था।
अजंता की गुफाएँ
महाराष्ट्र के औरंगाबाद क्षेत्र के निकट स्थित अजंता की गुफाएँ भारतीय कला की विश्वविख्यात उपलब्धियों में गिनी जाती हैं। ये वाघोरा नदी की घाटी के निकट घोड़े की नाल के आकार की चट्टानी दीवार में बनाई गई हैं।
अजंता में कुल 30 गुफाएँ मानी जाती हैं, जिनमें अपूर्ण गुफाएँ भी शामिल हैं। इनमें पाँच चैत्यगृहों के रूप में पहचानी जाती हैं और शेष मुख्यतः विहार हैं। इनका निर्माण दो प्रमुख चरणों में हुआ—पहला चरण दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास तथा दूसरा चरण पाँचवीं और छठी शताब्दी ईस्वी में।
(A) अजंता के चैत्यगृह
अजंता के चैत्यगृहों में स्तूप, स्तंभों की पंक्तियाँ, लंबाकार मंडप और घुमावदार छत का संयोजन दिखाई देता है। प्रारंभिक चैत्यगृहों में बुद्ध की उपस्थिति को मुख्यतः स्तूप के माध्यम से व्यक्त किया गया, जबकि बाद के काल में बुद्ध की प्रतिमा को भी चैत्यगृह की योजना में सम्मिलित किया गया।
गुफा संख्या 9 और 10 प्रारंभिक चैत्यगृहों के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। गुफा संख्या 19 और 26 बाद के काल की विकसित चैत्य वास्तुकला का परिचय देती हैं। इनमें मूर्तिकला और सजावट का अधिक विस्तृत रूप दिखाई देता है।
(B) अजंता के विहार
अजंता के विहारों में प्रायः एक केंद्रीय मंडप होता है, जिसके चारों ओर भिक्षुओं के रहने के लिए छोटे कक्ष बनाए गए हैं। बाद के विहारों में पीछे की ओर बुद्ध की प्रतिमा वाला गर्भगृह भी मिलता है।
इन विहारों की योजना से पता चलता है कि समय के साथ बौद्ध मठों में पूजा और ध्यान के अतिरिक्त अध्ययन, सामूहिक जीवन तथा धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था अधिक विकसित हुई।
(C) अजंता की चित्रकला
अजंता की प्रसिद्धि का एक प्रमुख कारण इसकी भित्तिचित्र कला है। इन चित्रों में बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं, बोधिसत्त्वों, राजदरबारों, नगरजीवन, वस्त्रों, आभूषणों तथा प्रकृति के विविध रूपों का अंकन मिलता है।
चित्रों में मानव चेहरे के भाव, आँखों की अभिव्यक्ति, हाथों की मुद्राएँ और शरीर की लयात्मकता विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। चित्रकला और स्थापत्य का समन्वय अजंता की गुफाओं को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि समग्र कलात्मक अनुभव प्रदान करने वाला परिसर बनाता है।
अजंता की कला से प्राचीन भारतीय समाज के वस्त्र, आभूषण, संगीत, सामाजिक संबंध और धार्मिक विचारों के अध्ययन में भी सहायता मिलती है।
ओडिशा की उदयगिरि और खंडगिरि गुफाएँ
ओडिशा के भुवनेश्वर के निकट स्थित उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ जैन धार्मिक स्थापत्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इनका विकास मुख्यतः दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुआ। कलिंग के शासक खारवेल से संबंधित हाथीगुम्फा अभिलेख इस क्षेत्र के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
इन गुफाओं का स्वरूप पश्चिमी भारत के विशाल बौद्ध चैत्यगृहों से अलग है। यहाँ अनेक छोटे कक्ष, खुले बरामदे, सामने की ओर निकले हुए छज्जे, शिल्पांकित स्तंभ और सजावटी प्रवेशद्वार मिलते हैं। इनका उपयोग जैन साधुओं के निवास तथा धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जाता था।
(A) उदयगिरि की गुफाएँ
उदयगिरि की प्रमुख गुफाओं में रानीगुम्फा, हाथीगुम्फा और गणेशगुम्फा का उल्लेख किया जाता है। रानीगुम्फा विशेष रूप से अपने विस्तृत विन्यास और उत्कीर्ण दृश्यों के कारण प्रसिद्ध है।
रानीगुम्फा में दो स्तरों पर बने कक्ष और बरामदे दिखाई देते हैं। इसके मुखभाग पर अनेक आकृतियाँ, स्तंभ और सजावटी तत्व उत्कीर्ण हैं। इन दृश्यों से तत्कालीन जीवन, धार्मिक मान्यताओं और कलात्मक रुचियों की जानकारी मिलती है।
हाथीगुम्फा का ऐतिहासिक महत्त्व उसके अभिलेख के कारण है, जिसमें खारवेल के शासन और उपलब्धियों का विवरण मिलता है। यह गुफा भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है।
(B) खंडगिरि की गुफाएँ
खंडगिरि की गुफाओं में अनेक छोटे कक्ष और अलंकृत प्रवेशद्वार हैं। यहाँ की गुफाओं में धार्मिक प्रतीकों, मानव आकृतियों और सजावटी रूपांकनों का प्रयोग हुआ है।
उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि जैन समुदायों ने भी शैलकृत वास्तुकला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनका स्थापत्य स्थानीय परिस्थितियों और धार्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुआ।
एलोरा की गुफाएँ
महाराष्ट्र में स्थित एलोरा की गुफाएँ भारतीय शैलकृत वास्तुकला की अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में सम्मिलित हैं। यहाँ कुल 34 गुफाओं का समूह है, जिनका निर्माण मुख्यतः छठी से बारहवीं शताब्दी के बीच विभिन्न चरणों में हुआ। इनमें बौद्ध, सनातन और जैन परंपराओं से संबंधित स्मारक शामिल हैं।
(A) बौद्ध गुफाएँ
एलोरा की गुफाओं के प्रारंभिक समूह में बौद्ध मठ और पूजा-कक्ष प्रमुख हैं। यहाँ बहुमंजिला विहारों, स्तंभयुक्त मंडपों तथा बुद्ध और बोधिसत्त्वों की प्रतिमाओं का निर्माण किया गया।
गुफा संख्या 10, जिसे विश्वकर्मा गुफा अथवा बढ़ई की गुफा कहा जाता है, एक प्रसिद्ध चैत्यगृह है। इसमें स्तूप, स्तंभों की पंक्तियाँ और विशाल आंतरिक कक्ष है। इसके भीतर बुद्ध की प्रतिमा भी स्थापित है।
(B) हिंदू गुफाएँ
एलोरा के हिंदू गुफा-मंदिरों में शिव, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ तथा पौराणिक आख्यानों के दृश्य मिलते हैं। इनकी मूर्तिकला में विशालता, गतिशीलता और जटिल शिल्प-योजना विशेष रूप से दिखाई देती है।
(C) कैलाश मंदिर
एलोरा का कैलाश मंदिर, जिसे गुफा संख्या 16 के रूप में जाना जाता है, भारतीय शैलकृत स्थापत्य की असाधारण उपलब्धि है। इसे एक विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर निर्मित किया गया था। यह स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर की तरह दिखाई देता है, जबकि इसकी पूरी संरचना एक ही चट्टानी खंड से तराशी गई है।
मंदिर में मंडप, गर्भगृह, विशाल प्रांगण, हाथियों की आकृतियाँ और पौराणिक दृश्य हैं। इसके निर्माण में पत्थर काटने की तकनीक, स्थापत्य योजना और मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
कैलाश मंदिर यह दर्शाता है कि शैलकृत वास्तुकला केवल गुफा के भीतर कक्ष बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि कलाकारों ने चट्टान से संपूर्ण मंदिर परिसर भी निर्मित किया।
(D) जैन गुफाएँ
एलोरा के अंतिम समूह में जैन गुफाएँ हैं। इनमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ, ध्यानमग्न आकृतियाँ, स्तंभों और छतों पर अलंकरण तथा सूक्ष्म नक्काशी दिखाई देती है।
एलोरा का विशेष महत्त्व इस बात में है कि एक ही क्षेत्र में तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं के स्मारक निर्मित हुए। यह भारतीय स्थापत्य के विविध धार्मिक समुदायों और उनकी कलात्मक उपलब्धियों का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
एलीफैंटा के गुफा-मंदिर
मुंबई के निकट एलीफैंटा द्वीप पर स्थित गुफा-मंदिर भारतीय शैलकृत वास्तुकला के प्रसिद्ध उदाहरण हैं। इनका विकास सामान्यतः पाँचवीं से छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास माना जाता है।
एलीफैंटा की प्रमुख गुफा में शिव से संबंधित विशाल प्रतिमाएँ और अनेक धार्मिक दृश्य उत्कीर्ण हैं। इनमें त्रिमूर्ति विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इस विशाल प्रतिमा में शिव के तीन मुखों के माध्यम से उनके विभिन्न रूपों की कलात्मक अभिव्यक्ति की व्याख्या की जाती है।
गुफा के भीतर स्तंभयुक्त मंडप, गर्भगृह और अनेक शिल्प-पटल हैं। इनकी योजना में धार्मिक अनुष्ठान और मूर्तिकला को एक साथ जोड़ा गया है।
एलीफैंटा की मूर्तियों में विशालता, संतुलन और गंभीर भावाभिव्यक्ति का विशेष महत्त्व है। यहाँ कलाकारों ने प्राकृतिक चट्टान को तराशकर ऐसी प्रतिमाएँ निर्मित कीं जिनमें धार्मिक विचारों को भव्य दृश्य रूप मिला।
मामल्लपुरम की शैलकृत वास्तुकला
तमिलनाडु के मामल्लपुरम में पल्लव शासकों के संरक्षण में सातवीं और आठवीं शताब्दी के दौरान गुफा-मंदिर, एकाश्म रथ और विशाल उत्कीर्णन निर्मित हुए।
यहाँ के शैलकृत स्मारक भारतीय वास्तुकला के विकास में एक महत्त्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ संरचनाएँ सीधे चट्टान को काटकर बनाई गईं, जबकि कुछ एक ही चट्टानी खंड को तराशकर रथाकार मंदिरों के रूप में निर्मित की गईं।
मामल्लपुरम का प्रसिद्ध विशाल शिल्प-पटल, जिसे ‘गंगावतरण’ अथवा ‘अर्जुन की तपस्या’ कहा जाता है, अनेक आकृतियों और प्राकृतिक तत्वों का सुंदर संयोजन है। इसमें ऋषि, देवता, नाग, पशु और अन्य आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
मामल्लपुरम की कला में गुफा-वास्तुकला से स्वतंत्र रूप से निर्मित पत्थर के मंदिरों की ओर बढ़ने की प्रक्रिया स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ शैलकृत और संरचनात्मक वास्तुकला दोनों का विकास हुआ।
गुफा-वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ
प्राचीन भारतीय गुफा-वास्तुकला में अनेक स्थापत्य और कलात्मक विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
पहली विशेषता—चट्टान में निर्माण: इन गुफाओं को प्राकृतिक पर्वत अथवा चट्टान को काटकर बनाया गया। इससे स्थायी और टिकाऊ धार्मिक संरचनाएँ निर्मित हुईं।
दूसरी विशेषता—धार्मिक उपयोग: गुफाओं का उपयोग पूजा, ध्यान, भिक्षुओं के निवास और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए किया जाता था।
तीसरी विशेषता—स्थापत्य योजना: चैत्यगृहों में लंबा कक्ष, स्तंभों की पंक्तियाँ और स्तूप प्रमुख होते थे, जबकि विहारों में केंद्रीय मंडप तथा आवासीय कक्ष मिलते हैं।
चौथी विशेषता—लकड़ी की परंपरा का प्रभाव: प्रारंभिक गुफाओं में छतों, बीमों और प्रवेशद्वारों के ऐसे रूप मिलते हैं जो लकड़ी से निर्मित भवनों की परंपरा की याद दिलाते हैं।
पाँचवीं विशेषता—मूर्तिकला और चित्रकला का समन्वय: अजंता, एलोरा, एलीफैंटा और मामल्लपुरम जैसे केंद्रों में वास्तुकला के साथ चित्रकला और मूर्तिकला का उत्कृष्ट विकास हुआ।
छठी विशेषता—क्षेत्रीय विविधता: बराबर की सादी और चमकदार गुफाओं से लेकर कार्ले के विशाल चैत्यगृह, उदयगिरि-खंडगिरि के अलंकृत कक्ष और एलोरा के विशाल मंदिर तक अनेक स्थानीय शैलियाँ विकसित हुईं।
गुफा-मंदिरों से स्वतंत्र मंदिर स्थापत्य की ओर
भारतीय वास्तुकला के इतिहास में गुफा-मंदिरों के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से निर्मित धार्मिक भवनों की परंपरा भी विकसित होती रही। प्रारंभिक मंदिरों का निर्माण लकड़ी, मिट्टी, ईंट और पत्थर जैसी सामग्रियों से किया जाता था। लकड़ी और मिट्टी से बने अनेक प्राचीन भवन समय के साथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके प्रमाण सीमित हैं।
राजस्थान के बैराट क्षेत्र से प्राप्त वृत्ताकार मंदिर के अवशेष प्रारंभिक स्वतंत्र धार्मिक वास्तुकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरणों में गिने जाते हैं। इसके अवशेष मौर्यकालीन अथवा उसके आसपास की प्रारंभिक परंपरा से संबंधित माने जाते हैं।
गुप्तकाल तक आते-आते स्वतंत्र रूप से निर्मित पत्थर और ईंट के मंदिरों के अधिक स्पष्ट उदाहरण उपलब्ध होने लगते हैं। इनमें गर्भगृह, मंडप, प्रवेशद्वार और शिखर जैसे स्थापत्य तत्व क्रमशः विकसित हुए।
इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि गुप्तकाल से पहले स्वतंत्र मंदिरों का निर्माण बिल्कुल नहीं होता था। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि गुप्तकाल से स्वतंत्र मंदिर स्थापत्य के ऐसे प्रमाण अधिक स्पष्ट और सुरक्षित रूप में मिलने लगते हैं, जिनके आधार पर इसकी संरचना और विकास का अध्ययन किया जा सकता है।
गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य
गुप्तकाल में मंदिर निर्माण की परंपरा को महत्त्वपूर्ण गति मिली। इस काल के मंदिर सामान्यतः आकार में छोटे थे, परंतु उनकी योजना और स्थापत्य-तत्व आगे की मंदिर परंपराओं के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।
प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिरों में समतल छत वाले छोटे गर्भगृह और सामने की ओर स्तंभयुक्त प्रवेश-मंडप मिलते हैं। कुछ मंदिरों में ऊँचे चबूतरे तथा अलंकृत द्वार भी दिखाई देते हैं।
गुप्तकालीन मंदिर
