Jhansi Ki Rangmanch Parampara झांसी की रंगमंच परम्परा

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Jhansi Ki Rangmanch Parampara झांसी की रंगमंच परम्परा

सच कहा जाए तो जिदंगी के रंगों का मंचन है रंगमंच । जीवन और रंगमंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मराठा शासकों के दौर में जब झांसी में साहित्य समृद्धि के शिखर पर था तव रंगमंच के क्षेत्र में भी कई आयाम जुड़े थे, आजादी के बाद भी रंगमंच परम्परा का सुहाना सफर अब तक जारी है।

मराठा शासन से अब तक झांसी की रंगमंच परम्परा

आजादी के बाद रंगमंच के शौकीन पात्रों ने मुम्बई का रूख कर लिया। मुम्बई में श्री राम मुखर्जी, जॉय मुखर्जी, रानी मुखर्जी ने सिने जगत में कई कीर्तिमान स्थापित किए। झांसी में मराठा शासन में कलाकारों के लिये राजा गंगाधर राव ने भव्य नाट्यशाला स्थापित की थी। झांसी के अलावा अन्य राज्यों से कलाकार यहां आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। मराठा काल में रंगमंच लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गया था।

मराठा राज्य में रानी महल जो पूर्व सरकारी हवेली कहलाती थी के पीछे भव्य नाट्यशाला बनाई गई थी। झांसी नरेश गंगाधर राव खुद अभिनय के बेहतरीन जानकार थे। माझा प्रवास में गोडसे लिखते हैं कि होली के अवसर पर कोंकण की एक नाट्य मंडली झांसी आई थी। शहर के लोगों ने पत्र भेजकर उन्हें बुलाया था। जब शहर में उनके कई नाटक खेले गए तब बाई साव ने झांसी की तरफ से उनके खाने-पीने का प्रबंध कर दिया और किले में बुलाकर तमाम नाटक करवाए गए।

गंगाधर राव के काल में नाट्यशाला की प्रमुख अभिनेत्रियां नर्तकियों में नौरत वाई, पत्रा बाई, मोतीबाई, हीराबाई, जवाहर बाई और सुरूप बाई थी। मेजर स्लीमेन जब दिसम्बर 1835 में झांसी आया था तव राजा रघुनाथ राव ने उसके मनोरंजन के लिये नृत्यांगनाओं और गवैयों को बुलाया था। रणवाद्यों के अलावा शहनाई, सितार आदि वाद्ययंत्रों का प्रचलन था और नक्कारखानों में शहनाई बजा करती थी। झांसी के लोगों में अच्छे रहन-सहन के अलावा गायन-वादन, नाटक और पठन-पाठन में गहरी रुचि थी।

आजादी के बाद झांसी के शशिधर मुखर्जी, सुबोध मुखर्जी, प्रबोध मुखर्जी ने सिने जगत में धूम मचाने के लिये मुम्बई का रूख किया। मुम्बई में इनके अलावा श्रीराम मुखर्जी, जायँ मुखर्जी, रानी मुखर्जी, एन ए अंसारी, हास्य कलाकार श्रीराम तिवारी, आर डी साहनी, शैलेन्द्र, इन्दीवर बरूआसागर आदि ने सिने जगत में खूब धूम मचाई।

रानी मुखर्जी तो अब भी फिल्मों में अभिनय कर सुखियां बटोर रही हैं। मुखर्जी परिवार का पैतृक मकान आज भी फूटा चौपड़ा सैंयर गेट अन्दर काली वाडी के  निकट बना हुआ है, जिसमें अब हरे राम हरे कृष्णा मंदिर बन गया है।

मुखर्जी परिवार ने अपने पैतृक मकान का कुछ हिस्सा इस्कॉन मंदिर के लिये दान कर दिया था। बाकी हिस्से में मुखर्जी परिवार के करना जरूरी है कि आजादी के बाद सबसे सदस्य निवासरत् हैं। इसके इतर यह उल्लेख पहले झांसी में कला मंदिर टॉकीज स्थापित की गई थी। उसके उपरांत लास्कला, इलाइट, नंदनी, लक्ष्मी, चित्रा, खिलैना, नटराज, भूषण टाकीज प्रेमनगर झांसी में बनीं, जो मनोरंजन का केन्द्र विन्दु रही। पुराने नाटककारों में राम प्रसाद नौराही ने भी अपने समय में खूब नाटक खेले।

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