बुन्देलखण्ड की संस्कृति में ‘अतिथि देवो भवः’ की भावना का विशेष महत्त्व है। यहाँ अतिथि को देवतुल्य मानकर उसका आदर-सत्कार करना लोकजीवन की पुरानी परंपरा रही है। मेहमानों की आवभगत, आत्मीय स्वागत और प्रेमपूर्वक भोजन कराना बुन्देली संस्कृति की विशिष्ट पहचान है।
बुन्देलखण्ड के लोग अपनी सरलता, सहजता और उदार हृदय के लिए जाने जाते हैं। घर पर कोई अतिथि आ जाए तो उसका स्वागत करना, उसके हालचाल पूछना और यथासंभव उत्तम भोजन कराना गृहस्थ का सौभाग्य माना जाता है। अतिथि के सामने भोजन परोसते समय अपनापन और आत्मीयता दिखाई देती है। यहाँ सत्कार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि हृदय से निभाया जाने वाला संबंध है।
बुंदेलखण्ड की संस्कृति
आवें इतै पाहुनें तौ पलकन पै पारे जावें ।
जौ लौ कछू न खा लें तौ लौ खालें उतर न पावें ।।
जीवन में भू-खन मरिवे कौ इतै भान न होवै ।
इतै अन्न कौ समाधान तौ समाधान से होवै ।।
मुरका देत स्वाद कछु मुरका खट्टी कढ़ी करी है।
अरु बुंदेली बरा – बरी की नहिं कउँ बराबरी है ।।
आल्हा के तेगा के पानी पै बुंदेली-पानी ।
पानी माँग गये गोरा, जब रानी लई कृपानी ।।
जोर जोर धरती रई आँचर में हीरन की घानी ।
धरती के हीरन की ऐसी धरती भई रजधानी ।।
पैरें नारी उन्ना लत्ता जी खाँ जैसे पूँजें ।
अकती परैं इतै वर पूजें पी-पर कोउ न पूजें ।।
पहिर लाज कौ गानौं मों पै लमटेरा कौ गानौ ।
तब जानौ कै हो रव इनकौ गंगा जू पै जानौ ।।
जब बुंदेलखण्ड के पानी पै विपदा छाती है।
इतै मरद के पीठ नईं है बस ताती छाती है ।।
रमतूला में रण तुरही कौ सुर बोलत अलबेला ।
अलगोजन में अलिगुंजन को समझो जात झमेला ।।
भये व्यास कवि और व्यास कवियन की काँ लौ कइये ।
जय बुंदेली भूमि शीष पै तोरी अशीषें चइये ।।
वर – बड का पेढ /दूल्हा
मुरका – मोड देना /महुए का व्यंजन
पीपर – पीपल का पेड़ /पराया वर
समाधान से होवै – एक प्रकार का प्राकृतिक धान जिसे संवाधान भी कहते हैं।
रचनाकार – पद्मश्री डॉ.अवध किशोर जड़िया
