Rangat Ki Fagen रंगत की फागें

349
Rangat Ki Fagen रंगत की फागें
Rangat Ki Fagen रंगत की फागें

बुन्देलखण्ड के फागकारों ने एक वस्तु विषयक फागें फड़बाजी में कहीं हैं। इन फाग कवियों ने नख-शिख, सोलह श्रंगार तथा बारह आभूषणों का वर्णन रीतिकालीन कवियों की भांति सफलता पूर्वक किया है। इस कारण इन्हे Rangat Ki Fagen रंगत की फागें कहा गया । वेणी, काजल, गुदना, महावर, मेंहदी आदि का वर्णन चमत्कार पूर्ण ढंग से किया है। नेत्र विषयक रंगत की एक फाग प्रस्तुत हैं –

दोऊ नैनन की तरवारें, प्यारी फिरै उबारे ।

अलेमान गुजरात सिरोही, सुलेमान झक मारे ।

ऐंची बाड म्यान घूँघट की, दै काजर की धारे।

ईसुरी श्याम बरकते रइयौ, अदियारे उजियारे।

इसी रंगत की गंगाधर जी की एक फाग इस प्रकार हैं-

दोऊ नैनन की तरवारे जात बेदरदिन मारें ।

लम्बी खोर दूर लौ डारे, ठाढौ हती उबारे ।

दुबरी दशा देह की हो गई, हिलत चली गई धारें।

गंगाधर बस होत सुधर पै बेरहमन में हारै ।

Rangat Ki Fagen

बागेश्वर धाम क्या है