चित्रकला मानव की प्राचीनतम कलात्मक अभिव्यक्तियों में से एक है। जब मनुष्य प्रकृति के निकट रहते हुए गुफाओं और प्राकृतिक शैलाश्रयों में निवास करता था, तभी से उसने अपने अनुभवों, विचारों और आसपास के परिवेश को रेखाओं तथा आकृतियों के माध्यम से व्यक्त करना आरंभ कर दिया था। प्रारंभिक मानव द्वारा बनाए गए चित्रों में पशु-पक्षियों, शिकार के दृश्यों, सामूहिक गतिविधियों, युद्ध तथा धार्मिक विश्वासों से संबंधित आकृतियाँ मिलती हैं। ये चित्र मानव की कल्पनाशक्ति, निरीक्षण क्षमता और अभिव्यक्ति की सहज प्रवृत्ति के प्रमाण हैं।
भारतीय संस्कृति में चित्रकला का विकास लोकजीवन, धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक परंपराओं और कलात्मक चेतना के साथ हुआ। चित्रकला केवल सौंदर्याभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रही, बल्कि उसने मानव के अनुभवों, स्मृतियों, विश्वासों और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राचीन भारत में गुफाओं की दीवारों, मिट्टी के बर्तनों, मुहरों, मंदिरों, महलों, वस्त्रों, लकड़ी, ताड़पत्रों तथा बाद में कागज पर चित्र बनाए जाते थे।
भारतीय चित्रकला की परंपरा को समझने के लिए प्रागैतिहासिक शैलचित्रों, हड़प्पा सभ्यता की कलात्मक अभिव्यक्तियों, प्राचीन साहित्य में चित्रकला के उल्लेखों, बौद्ध गुफा-चित्रों तथा विभिन्न राजवंशों के संरक्षण में विकसित चित्रशैलियों का अध्ययन आवश्यक है। इन सभी परंपराओं में भारतीय समाज की धार्मिक, सामाजिक और कलात्मक विविधता दिखाई देती है।
प्रागैतिहासिक काल में चित्रकला का विकास
प्रागैतिहासिक काल में चित्रकला का विकास मानव की सहज अभिव्यक्ति के रूप में हुआ। उस समय न तो आधुनिक अर्थों में चित्रकला के विद्यालय थे और न ही कलाकारों के लिए लिखित नियमों की व्यवस्थित परंपरा। प्राकृतिक वातावरण में उपलब्ध रंगीन खनिजों, मिट्टी तथा अन्य पदार्थों से मानव चट्टानों और गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाता था।
प्रागैतिहासिक चित्रों में पशुओं की आकृतियाँ विशेष रूप से मिलती हैं। हिरण, बैल, हाथी, जंगली सूअर तथा अन्य जीवों के चित्रों के साथ शिकार करते मनुष्यों, समूह में नृत्य करते लोगों और सामूहिक गतिविधियों के दृश्य भी अंकित हैं। इन चित्रों से तत्कालीन मानव के जीवन, उसके प्राकृतिक परिवेश और सामूहिक व्यवहार की जानकारी मिलती है।
इन चित्रों के निर्माण में लाल गेरू, हेमेटाइट जैसे लौह-युक्त खनिजों, सफेद मिट्टी तथा अन्य प्राकृतिक रंगद्रव्यों का उपयोग किया जाता था। चित्रों की रेखाएँ कहीं सरल और कहीं गतिशील हैं। कुछ आकृतियों में पशुओं के शरीर, पैरों और सींगों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है, जबकि कुछ चित्रों में मानव आकृतियों को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रत्येक प्रागैतिहासिक चित्र का उद्देश्य निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। कुछ चित्र शिकार और दैनिक जीवन से संबंधित हो सकते हैं, जबकि कुछ का संबंध अनुष्ठानों, सामूहिक स्मृतियों या अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों से रहा होगा।भारत के प्रमुख प्रागैतिहासिक शैलचित्र स्थल
भारत के विभिन्न भागों में प्रागैतिहासिक चित्रों के अनेक स्थल प्राप्त हुए हैं। ये स्थल भारतीय चित्रकला की प्राचीनता और भौगोलिक विविधता को दर्शाते हैं।
(A) भीमबेटका
मध्य प्रदेश में भोपाल के निकट स्थित भीमबेटका के शैलाश्रय भारतीय प्रागैतिहासिक कला के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थलों में गिने जाते हैं। यहाँ प्राकृतिक चट्टानों और शैलाश्रयों की दीवारों पर अनेक कालखंडों के चित्र प्राप्त हुए हैं। इनमें शिकार, पशु-पक्षियों, मानव समूहों, नृत्य, युद्ध और सामूहिक जीवन के दृश्य शामिल हैं।
भीमबेटका के चित्रों की विशेषता उनकी विषय-विविधता तथा आकृतियों में दिखाई देने वाली गति है। कुछ चित्रों में मनुष्य को हथियारों के साथ शिकार करते हुए दिखाया गया है, जबकि अन्य में समूहगत गतिविधियों का चित्रण है। इनसे तत्कालीन मानव के जीवन और प्राकृतिक परिवेश के बीच घनिष्ठ संबंध का पता चलता है।
यहाँ के सभी चित्र एक ही समय के नहीं हैं। विभिन्न चित्रों का संबंध अलग-अलग कालखंडों से है। इसलिए भीमबेटका को केवल एक प्रागैतिहासिक काल की कला के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह मानव की दीर्घकालीन सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
(B) पंचमढ़ी और महादेव पहाड़ी क्षेत्र
मध्य प्रदेश के पंचमढ़ी तथा महादेव पहाड़ी क्षेत्र में भी शैलचित्रों के उदाहरण मिलते हैं। इन चित्रों में पशुओं, मानव आकृतियों और दैनिक जीवन से संबंधित दृश्यों का चित्रण मिलता है। प्राकृतिक शैलाश्रयों में सुरक्षित ये चित्र बताते हैं कि मध्य भारत के विभिन्न भागों में चित्र बनाने की परंपरा लंबे समय तक प्रचलित रही।
(C) सिंघनपुर और कबरा पहाड़
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र में सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ के शैलचित्र उल्लेखनीय हैं। इन स्थलों पर मानव आकृतियों, पशुओं और विभिन्न रेखात्मक रूपों का चित्रण मिलता है। इनके अध्ययन से मध्य भारत में प्रागैतिहासिक कला के प्रसार और क्षेत्रीय विशेषताओं की जानकारी प्राप्त होती है।
(D) मिर्जापुर क्षेत्र की चित्रित दरियाँ
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर क्षेत्र में भी अनेक प्राकृतिक शैलाश्रय हैं, जिनकी दीवारों पर प्राचीन चित्र मिले हैं। लिखुनिया दरी, कोहबर दरी तथा मेहरिया दरी जैसे स्थलों का उल्लेख इस संदर्भ में किया जाता है। स्थानीय बोलचाल में प्राकृतिक शैलाश्रयों को दरी या दर्रा कहा जाता है।
इन चित्रों में शिकार, पशुओं, मानव समूहों और अन्य गतिविधियों के दृश्य मिलते हैं। मध्य भारत के अन्य शैलचित्र स्थलों की तरह ये भी प्राचीन मानव के जीवन और कलात्मक अभिव्यक्ति को समझने के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
हड़प्पा सभ्यता में चित्रकला
हड़प्पा सभ्यता अथवा सिंधु सभ्यता के परिपक्व चरण का समय लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व माना जाता है। इस काल में चित्रांकन की परंपरा विविध रूपों में विकसित थी। मिट्टी के बर्तनों, मुहरों, छोटी कलाकृतियों तथा अन्य वस्तुओं पर अंकित चित्र तत्कालीन कलाकारों की दक्षता और सौंदर्यबोध का परिचय देते हैं।
(A) मृद्भांडों पर चित्रांकन
हड़प्पा सभ्यता के चित्रित मृद्भांड भारतीय कला के प्राचीन उदाहरण हैं। इन बर्तनों पर प्रायः लाल रंग की पृष्ठभूमि के ऊपर काले रंग से चित्र बनाए जाते थे। ज्यामितीय आकृतियों, लहरदार रेखाओं, वृत्तों, त्रिभुजों, जालीदार रूपों तथा वनस्पतियों से प्रेरित आकृतियों का विशेष प्रयोग मिलता है।
कुछ बर्तनों पर पशु-पक्षियों और प्राकृतिक रूपों का भी चित्रण मिलता है। इन चित्रों की रचना में रेखाओं का संतुलित उपयोग तथा आकृतियों की व्यवस्थित प्रस्तुति उल्लेखनीय है। बर्तनों पर चित्रांकन से यह ज्ञात होता है कि उपयोगी वस्तुओं को भी कलात्मक रूप देने की परंपरा विकसित थी।
(B) मुहरों पर अंकित आकृतियाँ
हड़प्पा सभ्यता की मुहरें कला और पुरातत्त्व की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें अनेक मुहरें सेलखड़ी अथवा स्टियाटाइट से निर्मित हैं। इन पर पशुओं, प्रतीकात्मक आकृतियों और लघु लेखों का अंकन मिलता है।
मुहरों पर एक सींग वाले काल्पनिक अथवा शैलीबद्ध पशु की आकृति विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसे सामान्यतः ‘एकशृंगी’ या ‘यूनिकॉर्न’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त बैल, हाथी, गैंडा, बाघ और अन्य पशुओं की आकृतियाँ भी मिलती हैं।
इन आकृतियों में पशुओं के शरीर, सींगों, पैरों और मुख की रचना अत्यंत सूक्ष्मता से की गई है। छोटी-सी सतह पर इतने स्पष्ट रूप में आकृतियों को उकेरना हड़प्पाई कलाकारों के तकनीकी कौशल का प्रमाण है।
हालाँकि इन पशुओं की सभी आकृतियों की पहचान निश्चित नहीं है। विशेष रूप से एकशृंगी पशु की पहचान ऋग्वेद में वर्णित किसी विशिष्ट जीव से करना प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार मुहरों पर अंकित प्रत्येक आकृति के धार्मिक अर्थ के विषय में भी सावधानी आवश्यक है।
(C) धार्मिक और प्रतीकात्मक चित्रांकन
हड़प्पा सभ्यता की कुछ मुहरों पर वृक्षों, पशुओं, मानव आकृतियों तथा विभिन्न प्रतीकों का संयोजन दिखाई देता है। कुछ चित्रों को धार्मिक या अनुष्ठानिक संदर्भों में समझने का प्रयास किया गया है। कुछ मुहरों पर वृक्ष अथवा वेदिका जैसी संरचनाओं से संबंधित आकृतियाँ भी मिलती हैं।
इन चित्रों से तत्कालीन समाज की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति और कलात्मक कल्पनाशक्ति का परिचय मिलता है। लेकिन किसी विशिष्ट आकृति को निश्चित देवता, ध्वजचिह्न अथवा स्तंभ-पूजा की परंपरा से जोड़ने के लिए अतिरिक्त प्रमाणों की आवश्यकता होती है। अतः हड़प्पाई चित्रों का अध्ययन पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर करना अधिक उचित है।

वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में चित्रकला के संकेत
प्राचीन भारतीय साहित्य में चित्र, छाया, रूप तथा दृश्य अभिव्यक्ति से संबंधित अनेक शब्द और संदर्भ मिलते हैं। वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में प्रयुक्त कुछ शब्दों को चित्रकला के इतिहास से जोड़कर देखा गया है। फिर भी इन सभी संदर्भों को विकसित चित्रकला के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्वीकार करने से पहले उनके प्रसंग और अर्थ का अध्ययन आवश्यक है।
उत्तरवैदिक काल तथा उसके बाद के साहित्य में कलात्मक अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों का उल्लेख बढ़ता दिखाई देता है। इनसे ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में दृश्य सौंदर्य, सजावट और आकृतियों के प्रति रुचि विद्यमान थी।
बौद्ध साहित्य, विशेषकर जातक कथाओं में चित्र, चित्रित भवनों और कलात्मक सजावट से संबंधित संदर्भ मिलते हैं। जातक कथाएँ तत्कालीन सामाजिक जीवन, राजमहलों, नगरों, व्यापारिक समुदायों और धार्मिक परिवेश का वर्णन करती हैं। इनके आधार पर यह समझने में सहायता मिलती है कि चित्रकला का संबंध केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं था, बल्कि लौकिक जीवन में भी उसका महत्त्व था।
प्राचीन साहित्य में चित्रकला का उल्लेख उसके सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण है। हालाँकि किसी साहित्यिक उल्लेख से किसी विशिष्ट चित्र के वास्तविक स्वरूप या निर्माण तकनीक की जानकारी तभी प्राप्त हो सकती है, जब उसके साथ अन्य साक्ष्य भी उपलब्ध हों।
बौद्ध साहित्य और चित्रकला की परंपरा
बौद्ध धर्म के विकास के साथ भारत में धार्मिक कला और चित्रांकन की अनेक परंपराएँ विकसित हुईं। बौद्ध विहारों, चैत्यगृहों तथा अन्य धार्मिक स्थलों में चित्रों का उपयोग धार्मिक कथाओं, बुद्ध के जीवन और बौद्ध आदर्शों को अभिव्यक्त करने के लिए किया गया।
जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानियाँ वर्णित हैं। इन कथाओं में त्याग, करुणा, दान, सत्य और नैतिक आचरण जैसे मूल्यों पर बल दिया गया है। आगे चलकर अनेक बौद्ध चित्रों में जातक कथाओं और बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रसंगों को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया गया।
बौद्ध चित्रकला में धार्मिक विषयों के साथ राजकीय जीवन, उत्सव, वन्यजीवन, पशु-पक्षियों, नगरों तथा सामान्य लोगों की गतिविधियों का भी चित्रण हुआ। इस प्रकार धार्मिक कला के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक जीवन की अनेक झलकियाँ सुरक्षित हुईं।
बौद्ध ग्रंथों में चित्रों की आकर्षकता और उनके प्रभाव से संबंधित संदर्भ भी मिलते हैं। इनसे तत्कालीन समाज में चित्रकला की प्रतिष्ठा और दृश्य कला के प्रति रुचि का संकेत मिलता है। किंतु यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि बुद्ध ने सभी भिक्षुओं के लिए चित्र देखना सामान्य रूप से निषिद्ध कर दिया था; ऐसे संदर्भों की व्याख्या उनके विशिष्ट धार्मिक और अनुशासनात्मक प्रसंगों में करनी चाहिए।
वात्स्यायन के कामसूत्र में चित्रकला के षडंग
प्राचीन भारतीय चित्रकला के सिद्धांतों में वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित चित्रकला के छह अंगों का विशेष स्थान है। इन छह अंगों को चित्र के षडंग कहा जाता है। ये चित्र की रचना, अनुपात, भावाभिव्यक्ति, सौंदर्य और रंग-प्रयोग को समझने के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं।
प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार है—
रूपभेदाः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम्।
सादृश्यं वर्णिकाभंगं इति चित्रं षडंगकम्॥
चित्रकला के छह अंग निम्नलिखित हैं—
1- रूपभेद: विभिन्न आकृतियों, रूपों और उनके विशिष्ट लक्षणों का ज्ञान। चित्रकार को मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और अन्य वस्तुओं के स्वरूप में अंतर पहचानना चाहिए।
2- प्रमाण: आकृतियों का उचित अनुपात, आकार और संरचना। किसी चित्र में शरीर के विभिन्न अंगों तथा अन्य वस्तुओं का संतुलित चित्रण इस सिद्धांत के अंतर्गत आता है।
3- भाव: चित्र में भावनाओं, मनःस्थितियों और मानसिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति। चेहरे के भाव, आँखों की दृष्टि तथा शरीर की मुद्रा से आनंद, करुणा, क्रोध और शांति जैसे भाव व्यक्त किए जा सकते हैं।
4- लावण्य-योजना: चित्र में सौंदर्य, माधुर्य और आकर्षण का संतुलित संयोजन। इसका संबंध केवल बाहरी सजावट से नहीं, बल्कि संपूर्ण रचना की सहज सुंदरता से है।
5- सादृश्य: चित्रित वस्तु या व्यक्ति के स्वरूप से समानता। इसमें किसी आकृति के प्रमुख लक्षणों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि उसका स्वरूप पहचाना जा सके।
6- वर्णिकाभंग: रंगों का उचित चयन, संयोजन और उनका कलात्मक प्रयोग। रंगों के विभिन्न भेद, उनकी तीव्रता, संतुलन तथा चित्र की समग्र रचना में उनकी भूमिका इसके अंतर्गत आती है।
चित्रकला के ये छह अंग भारतीय सौंदर्यशास्त्र की समृद्ध परंपरा को व्यक्त करते हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय कला-चिंतन में चित्रकला को केवल रेखाओं और रंगों का संयोजन नहीं माना गया, बल्कि उसमें रूप, भाव, अनुपात और सौंदर्य के समन्वय को महत्त्व दिया गया।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण और चित्रसूत्र
भारतीय चित्रकला के सिद्धांतों के अध्ययन में विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र का विशेष महत्त्व है। इसमें चित्रकला से संबंधित अनेक सैद्धांतिक और व्यावहारिक विषयों का विवेचन मिलता है। चित्रकला, मूर्तिकला तथा अन्य दृश्य कलाओं के परस्पर संबंधों को समझने के लिए भी यह ग्रंथ उपयोगी है।
चित्रसूत्र में आकृतियों के निर्माण, शरीर के अनुपात, भावाभिव्यक्ति, रंगों के उपयोग तथा विभिन्न विषयों के चित्रण से संबंधित विचार मिलते हैं। इसमें कलाकार के ज्ञान, अभ्यास और निरीक्षण की भूमिका पर भी बल दिया गया है।
इस परंपरा में प्रकृति और मानव शरीर के अध्ययन को महत्त्वपूर्ण माना गया। कलाकार को वस्तुओं के बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उनके विशिष्ट लक्षणों और भावात्मक प्रभावों को भी समझना आवश्यक था।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्रकला के संबंध में प्रस्तुत विचार यह दर्शाते हैं कि प्राचीन भारत में कला के व्यावहारिक अनुभव को सैद्धांतिक रूप देने का प्रयास किया गया था। इस प्रकार चित्रसूत्र भारतीय चित्रकला की परंपरा और सौंदर्यशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
प्राचीन भारत में चित्रकला के माध्यम
प्राचीन भारत में चित्रकला के लिए अनेक प्रकार के आधारों का उपयोग किया जाता था। चित्र बनाने की सामग्री और सतह का चयन उपलब्ध संसाधनों, चित्र के उद्देश्य तथा स्थानीय परंपराओं के अनुसार किया जाता था।
(A) भित्तिचित्र
दीवारों, गुफाओं, महलों, मंदिरों तथा विहारों की सतह पर बनाए गए चित्र भित्तिचित्र कहलाते हैं। प्राचीन भारत में भित्तिचित्रों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण परंपरा विकसित हुई। प्राकृतिक चट्टानों को काटकर बनाए गए धार्मिक स्थलों की दीवारों पर प्रायः सतह तैयार करने के बाद चित्र बनाए जाते थे।
इस प्रक्रिया में दीवार को समतल करके उस पर मिट्टी, चूने अथवा अन्य उपयुक्त पदार्थों का लेप लगाया जाता था। सतह सूखने या तैयार होने के बाद उस पर रेखांकन तथा रंगों का प्रयोग किया जाता था। अलग-अलग क्षेत्रों और कालखंडों में चित्र बनाने की तकनीक में अंतर मिलता है।
(B) वस्त्र पर चित्रांकन
कपड़े या वस्त्र पर चित्र बनाने की परंपरा भी प्राचीन भारत में विद्यमान थी। वस्त्र पर चित्रकारी धार्मिक उपयोग, सजावट अथवा अन्य प्रयोजनों के लिए की जा सकती थी। कपड़े की सतह पर चित्र बनाने के लिए उसे उपयुक्त रूप से तैयार करना आवश्यक होता था।
(C) लकड़ी पर चित्रांकन
लकड़ी का उपयोग भी चित्रांकन के आधार के रूप में किया जाता था। लकड़ी के फलक, सजावटी वस्तुएँ तथा अन्य कलात्मक संरचनाएँ चित्रकारी के लिए उपयोगी थीं। हालाँकि प्राचीन लकड़ी के अनेक नमूने नष्ट हो गए, इसलिए इस परंपरा के अध्ययन में साहित्यिक संदर्भों और सुरक्षित पुरावशेषों दोनों का महत्त्व है।
(D) ताड़पत्र और भोजपत्र
ताड़पत्र तथा भोजपत्र पर लेखन के साथ-साथ चित्रांकन की परंपरा भी विकसित हुई। इन माध्यमों का उपयोग विशेष रूप से पांडुलिपियों के निर्माण में किया गया। इन पर बने चित्र आकार में छोटे होते थे, इसलिए उनमें रेखाओं, रंगों और आकृतियों का संयमित प्रयोग आवश्यक था।
(E) पत्थर और हाथीदाँत
पत्थर तथा हाथीदाँत जैसी सामग्रियों पर भी कलात्मक आकृतियाँ बनाई जाती थीं। इन पर रंग लगाने अथवा अलंकरण करने की परंपराएँ अलग-अलग रूपों में मिलती हैं। इनके माध्यम से प्राचीन भारतीय कलाकारों की विविध शिल्पगत दक्षताओं का परिचय मिलता है।
(F) कागज पर चित्रांकन
भारत में कागज के व्यापक उपयोग के बाद पांडुलिपि चित्रकला और अन्य लघुचित्र परंपराओं को विशेष विस्तार मिला। बाद के मध्यकालीन और आधुनिक काल में कागज पर चित्रकारी भारतीय कला का अत्यंत महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गई।
जोगीमारा की गुफाओं के चित्र
मध्य प्रदेश के सरगुजा क्षेत्र में रामगढ़ पहाड़ियों के निकट स्थित जोगीमारा गुफा प्राचीन चित्रकला के उल्लेखनीय स्थलों में गिनी जाती है। यहाँ के चित्रों का संबंध प्राचीन भारतीय कलात्मक परंपरा से है। चित्रों के साथ प्राप्त अभिलेख भी इस स्थल के सांस्कृतिक महत्त्व को बढ़ाते हैं।
जोगीमारा के चित्रों में मानव आकृतियों और सजावटी रूपों के अवशेष मिलते हैं। इनका अध्ययन प्रारंभिक भारतीय चित्रकला की तकनीक, विषय और शैली को समझने में सहायक है।
हालाँकि यहाँ के चित्रों की वर्तमान स्थिति और उनकी तिथियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें भारत के सभी प्राचीन चित्रों में निश्चित रूप से सबसे प्राचीन कहना उचित नहीं है। फिर भी जोगीमारा भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
अजंता की गुफाओं की चित्रकला
महाराष्ट्र में स्थित अजंता की गुफाएँ भारतीय चित्रकला की विश्वप्रसिद्ध धरोहर हैं। यहाँ की गुफाओं का निर्माण और अलंकरण अलग-अलग चरणों में हुआ। प्रारंभिक चरण का संबंध दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व से है, जबकि पाँचवीं और छठी शताब्दी ईस्वी में अनेक गुफाओं को नए रूप में विकसित तथा अलंकृत किया गया।
अजंता की चित्रकला में धार्मिक विषयों के साथ मानवीय भावनाओं, राजकीय जीवन, प्रकृति, पशु-पक्षियों तथा सामाजिक गतिविधियों का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है। यहाँ के चित्रों में रेखाओं की लयात्मकता, रंगों का संतुलन, चेहरे के भाव और शरीर की मुद्राएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
(A) बुद्ध के जीवन का चित्रण
अजंता की चित्रकला का प्रमुख विषय गौतम बुद्ध का जीवन और उनकी शिक्षाएँ हैं। बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रसंगों, बोधिसत्त्वों की आकृतियों तथा बौद्ध धार्मिक कथाओं को चित्रों में प्रस्तुत किया गया है।
इन चित्रों में आध्यात्मिकता के साथ मानवीय करुणा, शांति और संवेदनशीलता का प्रभाव दिखाई देता है। बुद्ध तथा बोधिसत्त्वों की आकृतियों को प्रायः गंभीर, शांत और प्रभावशाली भावों के साथ चित्रित किया गया है।
(B) जातक कथाओं का चित्रण
जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्वजन्मों से संबंधित कहानियाँ हैं। अजंता में इन कथाओं पर आधारित अनेक चित्र मिलते हैं। इनमें त्याग, करुणा, दानशीलता, सत्य और नैतिक आचरण जैसे मूल्यों को दृश्य रूप में व्यक्त किया गया है।
इन चित्रों में केवल मुख्य पात्रों को ही नहीं, बल्कि उनके आसपास के सामाजिक वातावरण को भी स्थान दिया गया है। राजमहलों, नगरों, वन्यजीवन, पशुओं, सेवकों और सामान्य लोगों की आकृतियाँ तत्कालीन जीवन के अनेक पक्षों को सामने लाती हैं।
(C) राजकीय और लौकिक जीवन
अजंता के चित्र केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं हैं। इनमें राजाओं, रानियों, राजपरिवारों, परिचारकों, व्यापारियों और विभिन्न सामाजिक वर्गों से संबंधित आकृतियाँ भी मिलती हैं।
वस्त्रों, आभूषणों, केश-विन्यास और सजावटी वस्तुओं के चित्रण से तत्कालीन जीवन-शैली के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। कलाकारों ने मानव शरीर की मुद्राओं और चेहरे के भावों के माध्यम से सामाजिक संबंधों तथा मानसिक अवस्थाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया।
(D) रंग और तकनीक
अजंता के चित्रों में लाल, पीले, भूरे, सफेद, काले और अन्य रंगों का प्रयोग मिलता है। चित्रों की सतह तैयार करने, रेखांकन करने और रंग भरने की तकनीक में उल्लेखनीय कौशल दिखाई देता है।
चित्रकारों ने सीमित स्थान में अनेक पात्रों और घटनाओं को व्यवस्थित किया। आकृतियों के आकार, रंगों और मुद्राओं के माध्यम से चित्रों में गहराई तथा दृश्यात्मक प्रभाव उत्पन्न किया गया।
अजंता की चित्रकला इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारतीय कलाकारों को रंग, रेखा, अनुपात और भावाभिव्यक्ति का गहरा ज्ञान था। यहाँ चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला का सुंदर समन्वय मिलता है।
बाघ की गुफाओं की चित्रकला
मध्य प्रदेश के धार क्षेत्र के निकट स्थित बाघ की गुफाएँ प्राचीन भारतीय भित्तिचित्रों के महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इन गुफाओं का संबंध मुख्यतः बौद्ध धार्मिक परंपरा से है। यहाँ प्राप्त चित्रों में मानव आकृतियों, धार्मिक विषयों तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन की झलक मिलती है।
बाघ के चित्रों में मानव आकृतियों की रचना, वस्त्रों की सजावट, रंगों का प्रयोग और रेखाओं की गतिशीलता उल्लेखनीय है। इन चित्रों में अजंता की भाँति केवल धार्मिक भाव ही नहीं, बल्कि मानवीय जीवन के विविध रूप भी दिखाई देते हैं।
अजंता और बाघ के चित्रों में कुछ कलात्मक समानताएँ दिखाई देती हैं, फिर भी दोनों की अपनी क्षेत्रीय और शैलीगत विशेषताएँ हैं। बाघ की चित्रकला भारतीय भित्तिचित्र परंपरा के विकास को समझने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
श्रीलंका के सिगिरिया चित्र और भारतीय कला का प्रभाव
श्रीलंका के सिगिरिया स्थल पर प्राप्त प्राचीन चित्र भी दक्षिण एशिया की चित्रकला परंपराओं के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ की प्रसिद्ध चित्रित मानव आकृतियों में स्त्रियों के चेहरे, आभूषण, केश-विन्यास और रंगों का सुंदर प्रयोग दिखाई देता है।
सिगिरिया के चित्रों और भारतीय भित्तिचित्र परंपराओं में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं। यह समानता दक्षिण एशिया में व्यापक सांस्कृतिक संपर्कों और कलात्मक विचारों के आदान-प्रदान की संभावना को दर्शाती है। हालाँकि इन सभी समानताओं को सीधे भारतीय चित्रकला के प्रभाव का परिणाम मानने के बजाय क्षेत्रीय परंपराओं और ऐतिहासिक संपर्कों के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
बौद्ध धर्म के प्रसार, व्यापारिक संबंधों और यात्राओं के माध्यम से भारत तथा अन्य एशियाई क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। चित्रकला की विभिन्न परंपराओं के अध्ययन से इस व्यापक संपर्क का परिचय मिलता है।
गुप्तकालीन चित्रकला
गुप्तकाल भारतीय कला और संस्कृति के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस काल में साहित्य, मूर्तिकला, वास्तुकला तथा अन्य कलाओं के साथ चित्रकला की परंपराएँ भी विकसित हुईं। अजंता की अनेक प्रसिद्ध चित्रावलियाँ पाँचवीं और छठी शताब्दी के व्यापक सांस्कृतिक परिवेश से संबंधित हैं।
गुप्तकालीन चित्रकला की विशेषताओं में मानव आकृतियों का संतुलित चित्रण, चेहरे के भावों की सूक्ष्मता, शरीर की सहज मुद्राएँ और रंगों का कलात्मक संयोजन उल्लेखनीय हैं। कलाकारों ने धार्मिक आदर्शों को मानवीय संवेदनाओं के साथ व्यक्त किया।
इस काल की चित्रकला में सौंदर्य और भावाभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। हालाँकि सभी चित्रों को सीधे गुप्त शासकों के संरक्षण से जोड़ना उचित नहीं है; अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न राजवंशों और दानदाताओं का योगदान रहा।
गुप्तोत्तर काल और पालकालीन चित्रकला
गुप्तकाल के बाद भारतीय चित्रकला का विकास एक ही दिशा में नहीं हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक परिवर्तन, धार्मिक गतिविधियों और स्थानीय संरक्षण के अनुसार चित्रकला की अनेक परंपराएँ विकसित होती रहीं।
पूर्वी भारत में पाल शासकों के समय बौद्ध कला और पांडुलिपि चित्रकला को विशेष महत्त्व मिला। ताड़पत्रों पर निर्मित सचित्र बौद्ध पांडुलिपियों में बुद्ध, बोधिसत्त्वों तथा अन्य धार्मिक आकृतियों का चित्रण मिलता है।
पालकालीन चित्रों में छोटे आकार की सतह पर सीमित स्थान का प्रभावशाली उपयोग, स्पष्ट रेखांकन और धार्मिक प्रतीकों का संयोजन उल्लेखनीय है। इस परंपरा का संबंध बौद्ध मठों, शिक्षा केंद्रों और पांडुलिपियों के निर्माण से रहा।
इस प्रकार गुप्तोत्तर काल में चित्रकला का ह्रास सर्वत्र नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में उसके स्वरूप और माध्यमों में परिवर्तन आया। कुछ क्षेत्रों में भित्तिचित्रों की परंपरा जारी रही, जबकि अन्य क्षेत्रों में पांडुलिपि चित्रकला ने विशेष विकास किया।
दक्षिण भारत की चित्रकला परंपरा
दक्षिण भारत में चित्रकला का विकास स्थानीय धार्मिक परंपराओं, मंदिर स्थापत्य और राजकीय संरक्षण के साथ हुआ। यहाँ विभिन्न कालखंडों में मंदिरों की दीवारों, धार्मिक भवनों तथा अन्य सतहों पर चित्र बनाए गए।
दक्षिण भारतीय चित्रकला में देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों और राजकीय जीवन से संबंधित विषयों को प्रमुखता मिली। विभिन्न क्षेत्रों की चित्रशैलियों में स्थानीय वस्त्रों, आभूषणों, शारीरिक मुद्राओं और सौंदर्यबोध की विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
कुछ चित्रों में स्थानीय जनसमुदायों के जीवन और परिवेश से प्रेरित आकृतियाँ भी मिलती हैं। इन्हें किसी एक समुदाय की शारीरिक बनावट से जोड़कर सामान्य निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। चित्रों में दिखाई देने वाली विशेषताओं को क्षेत्रीय शैली, कलाकार की दृष्टि और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर समझना चाहिए।
दक्षिण भारत की चित्रकला यह स्पष्ट करती है कि भारतीय कला किसी एक शैली तक सीमित नहीं थी। विभिन्न क्षेत्रों में विकसित परंपराओं ने भारतीय चित्रकला को विविधता और समृद्धि प्रदान की।
भारतीय संस्कृति में चित्रकला का महत्त्व
भारतीय संस्कृति में चित्रकला का महत्त्व अनेक स्तरों पर दिखाई देता है।
धार्मिक महत्त्व: चित्रों के माध्यम से देवी-देवताओं, बुद्ध के जीवन, जातक कथाओ
