महाकवि ईसुरी बुन्देली लोकसाहित्य के ऐसे विलक्षण रचनाकार थे, जिनकी काव्य-प्रतिभा का विस्तार श्रृंगार से लेकर भक्ति तक दिखाई देता है। उनकी फागों में जहाँ एक ओर प्रेम, सौन्दर्य और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर उनके धार्मिक काव्य में भक्ति, आत्मसमर्पण और आध्यात्मिक शान्ति की गहरी अनुभूति होती है। ‘ईसुरी के राधे-श्याम’ उनके साहित्यिक जीवन की उसी भक्तिमय धारा का परिचायक है, जिसमें सांसारिक प्रेम की अनुभूतियाँ धीरे-धीरे ईश्वर-प्रेम और भक्ति की व्यापक चेतना से जुड़ती दिखाई देती हैं।
महाकवि ईसुरी की पहचान मुख्यतः उनकी श्रृंगारिक फागों के कारण स्थापित हुई। उन्होंने रजऊ नायिका को सम्बोधित करके अनेक फागों की रचना की। इन फागों में प्रेम की विविध अनुभूतियाँ, मिलन की आकांक्षा, विरह की पीड़ा और मानवीय मन की कोमल भावनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं। रजऊ के प्रति उनकी काव्यात्मक अनुरक्ति ने उन्हें बुन्देली लोकसाहित्य में विशेष लोकप्रियता दिलाई। उनकी फागें जनमानस में गायी और सुनी जाने लगीं तथा ईसुरी का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।
किन्तु किसी रचनाकार की लोकप्रियता के साथ कभी-कभी विवाद भी जुड़ जाते हैं। ईसुरी की रजऊ-विषयक फागों को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएँ और आलोचनाएँ होने लगीं। उनके काव्य को लेकर उठने वाले विवादों तथा सामाजिक तानों ने उनके जीवन को प्रभावित किया। जिस प्रेमानुभूति को उन्होंने अपनी काव्य-साधना का विषय बनाया था, उसी को लेकर उन्हें समाज की उपेक्षा और आलोचना का सामना करना पड़ा। इस प्रकार की परिस्थितियों ने उनके मन को व्यथित किया और वे मानसिक शान्ति की तलाश में अपने जीवन तथा काव्य के अर्थ पर पुनर्विचार करने लगे।
वृन्दावन की ओर प्रस्थान
जीवन में जब सांसारिक परिस्थितियाँ मनुष्य को भीतर तक विचलित कर देती हैं, तब वह आत्मिक शान्ति की खोज में किसी ऐसे आश्रय की ओर उन्मुख होता है, जहाँ उसे अपने मन की व्यथा से मुक्ति मिल सके। ईसुरी के जीवन में वृन्दावन की यात्रा को इसी आध्यात्मिक परिवर्तन के संदर्भ में देखा जा सकता है। उपलब्ध जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, जीवन के उत्तरार्द्ध में लगभग तिरपन वर्ष की अवस्था में वे वृन्दावन गए। ब्रजभूमि की धार्मिक परम्परा, श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी स्मृतियाँ और वहाँ का भक्तिमय वातावरण उनके लिए नई अनुभूतियों का आधार बना।
वृन्दावन केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण-भक्ति की ऐसी सांस्कृतिक भूमि है, जहाँ प्रेम को आध्यात्मिक अनुभूति का स्वरूप प्राप्त होता है। यहाँ राधा और कृष्ण का प्रेम लौकिक सीमाओं से ऊपर उठकर भक्ति, समर्पण और आत्मिक एकत्व का प्रतीक बन जाता है। ब्रज की इसी भावभूमि में पहुँचकर ईसुरी को अपनी काव्य-चेतना के लिए एक नया आधार मिला। वे ब्रज के विभिन्न स्थलों पर गए, श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी परम्पराओं का अनुभव किया और वहाँ की भक्तिमय संस्कृति से प्रभावित हुए।
रजऊ के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति के कारण चर्चित रहे ईसुरी के लिए श्रीराधा-कृष्ण की भक्ति एक नए भावलोक का द्वार खोलती है। उनके जीवन में यह परिवर्तन केवल आराध्य के बदलने का प्रसंग नहीं, बल्कि प्रेम की अनुभूति को एक व्यापक आध्यात्मिक अर्थ देने वाली यात्रा के रूप में समझा जा सकता है। सांसारिक जीवन के अनुभवों, सामाजिक उपेक्षा और मानसिक व्याकुलता के बीच उन्हें भक्ति में शान्ति तथा आत्मिक संतोष का मार्ग दिखाई देने लगा।
रजऊ से राधे-श्याम तक की काव्य-यात्रा
महाकवि ईसुरी के साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके श्रृंगारिक और भक्तिपरक काव्य के बीच के संबंध को समझना आवश्यक है। उनकी रजऊ-विषयक फागों में प्रेम की तीव्रता, भावनाओं की सहजता और हृदय की व्याकुलता दिखाई देती है। दूसरी ओर, राधा-कृष्ण के प्रति समर्पित रचनाओं में प्रेम का एक ऐसा रूप सामने आता है, जो आराधना, श्रद्धा और आत्मनिवेदन से जुड़ जाता है।
यहाँ प्रेम और भक्ति को परस्पर विरोधी भावों के रूप में देखने के बजाय उनके बीच की भावात्मक निरन्तरता को समझना अधिक उचित होगा। भारतीय भक्तिकाव्य की परम्परा में प्रेम अनेक बार ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बना है। राधा-कृष्ण की लीलाओं में प्रेम, विरह, मिलन और समर्पण के भाव भक्त और भगवान के संबंध को व्यक्त करने के साधन बन जाते हैं। ईसुरी की भक्ति-चेतना को भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परम्परा के संदर्भ में देखा जा सकता है।
‘ईसुरी के राधे-श्याम’ में राधा और कृष्ण के प्रति अनुराग केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि हृदय की उस आकांक्षा का प्रतीक है, जो सांसारिक अशान्ति से निकलकर आत्मिक शान्ति प्राप्त करना चाहती है। इस भावभूमि में प्रेम की अनुभूति अधिक व्यापक हो जाती है। मनुष्य के व्यक्तिगत सुख-दुःख, विरह और व्याकुलता जैसे अनुभव भक्ति के माध्यम से एक नई अर्थवत्ता प्राप्त करते हैं।
ईसुरी की काव्य-प्रतिभा का महत्त्व इसी बात में है कि उन्होंने अपनी अनुभूतियों को लोकभाषा में अभिव्यक्त किया। बुन्देली की सहजता, आत्मीयता और भावप्रवणता ने उनकी रचनाओं को लोकजीवन से जोड़े रखा। भक्ति के गंभीर भावों को व्यक्त करने के लिए भी उन्हें किसी कृत्रिम भाषा या जटिल शैली की आवश्यकता नहीं थी। लोकभाषा के स्वाभाविक शब्दों और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम से वे अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त कर सकते थे।
श्रीकृष्ण-भक्ति में आत्मिक शान्ति की खोज
ईसुरी के वृन्दावन प्रवास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी आत्मिक शान्ति की खोज है। सांसारिक जीवन में प्रतिष्ठा, लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होने के बाद भी मनुष्य का अंतर्मन अनेक प्रश्नों से घिरा रह सकता है। बाहरी उपलब्धियाँ हमेशा आन्तरिक संतोष प्रदान नहीं करतीं। ईसुरी के जीवन से जुड़ा वृन्दावन-प्रसंग इसी मानवीय स्थिति की ओर संकेत करता है।
श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति में उन्हें ऐसा भावात्मक आश्रय मिला, जहाँ वे अपने मन की व्यथा को समर्पण में बदल सकते थे। भक्तिकाव्य में भगवान के चरणों में स्वयं को अर्पित करने का भाव अहंकार के त्याग और आत्मिक विनम्रता का प्रतीक है। भक्त अपने सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन की उलझनों को आराध्य के समक्ष रखकर मानसिक संतोष का अनुभव करता है।
ईसुरी की राधा-कृष्ण विषयक काव्य-धारा को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। यहाँ भक्ति जीवन से पलायन मात्र नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों को एक नए दृष्टिकोण से देखने का माध्यम बनती है। संसार की आलोचना और उपेक्षा से व्यथित मन जब भक्ति की ओर मुड़ता है, तब उसकी संवेदनाएँ नष्ट नहीं होतीं, बल्कि उन्हें अभिव्यक्ति का एक नया आधार मिलता है।
तीन वर्ष का ब्रज प्रवास और साहित्यिक परिवर्तन
प्रचलित जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, ईसुरी ने ब्रजभूमि में लगभग तीन वर्ष बिताए। इस अवधि को उनके जीवन और साहित्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ब्रज की धार्मिक परम्पराओं, श्रीकृष्ण की लीलाओं और राधा-कृष्ण की उपासना से जुड़ा वातावरण उनके भीतर भक्ति-भाव को विकसित करने वाला रहा होगा। उनके जीवन के इस चरण में धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों की ओर बढ़ता हुआ रुझान उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का एक उल्लेखनीय पक्ष है।
ईसुरी की रचनात्मकता का मूल आधार लोकजीवन से उनका गहरा जुड़ाव था। उन्होंने अपने आसपास के संसार को देखा, अनुभव किया और उसकी संवेदनाओं को अपनी फागों में स्थान दिया। यही लोकानुभव उनकी भक्ति-रचनाओं में भी महत्त्वपूर्ण दिखाई देता है। भक्ति के भावों को व्यक्त करते समय भी उनकी काव्य-चेतना लोकभाषा और लोकसंस्कृति से अलग नहीं होती।
उनके साहित्य में श्रृंगार से भक्ति की ओर हुए इस झुकाव को उनकी रचनात्मक यात्रा का विस्तार कहा जा सकता है। एक ओर मानवीय प्रेम की अनुभूतियाँ हैं, तो दूसरी ओर आराध्य के प्रति श्रद्धा और आत्मसमर्पण। इन दोनों के बीच भावनात्मक संवेदना का एक साझा आधार दिखाई देता है। यही कारण है कि ईसुरी के साहित्य को केवल श्रृंगारिक फागों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी धार्मिक रचनाएँ भी उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने के लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं।
भक्त और भगवान का संबंध
भारतीय भक्ति-परम्परा में यह विश्वास व्यापक रूप से प्रचलित है कि भगवान अपने भक्त के प्रेम और समर्पण से बँध जाते हैं। भक्त और भगवान का संबंध केवल पूजा-विधि या धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह आत्मीयता, विश्वास और प्रेम का संबंध बन जाता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं में यह भाव विशेष रूप से दिखाई देता है। वे कभी सखा के रूप में, कभी प्रियतम के रूप में और कभी भक्तों के रक्षक के रूप में सामने आते हैं।
राधा-कृष्ण की भक्ति में प्रेम का यह आत्मीय स्वरूप अपने चरम पर दिखाई देता है। राधा का समर्पण और कृष्ण के प्रति उनका अनुराग भक्तिकाव्य में जीवात्मा की परमात्मा के प्रति आकांक्षा के प्रतीक के रूप में भी व्याख्यायित किया गया है। इस परम्परा में प्रेम केवल प्राप्ति की इच्छा नहीं, बल्कि स्वयं को अर्पित कर देने की भावना है।
ईसुरी के ‘राधे-श्याम’ विषयक साहित्य को इसी भक्तिपरक दृष्टि से देखने पर उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का एक नया आयाम सामने आता है। उनकी काव्य-यात्रा यह संकेत देती है कि लोककवि का हृदय जीवन के विविध अनुभवों को आत्मसात करते हुए नए भावलोकों की ओर बढ़ सकता है। प्रेम की अनुभूति, सामाजिक जीवन के संघर्ष और आध्यात्मिक शान्ति की आकांक्षा मिलकर उसकी रचनात्मक चेतना को व्यापक बना सकते हैं।
बुन्देली साहित्य में ‘ईसुरी के राधे-श्याम’ का महत्त्व
महाकवि ईसुरी का योगदान इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने बुन्देली लोकसाहित्य को भावों की विविधता प्रदान की। उनकी रचनाओं में लोकजीवन की सहजता, प्रेम की अनुभूति, मानवीय संवेदना और भक्ति की आत्मीयता का समावेश मिलता है। उनकी लोकप्रियता का आधार केवल विषय-वस्तु नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की वह शक्ति भी है, जिसके माध्यम से वे लोकमानस से सीधा संबंध स्थापित करते हैं।
‘ईसुरी के राधे-श्याम’ उनके धार्मिक काव्य के अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। यह शीर्षक उनके साहित्य में राधा-कृष्ण के प्रति अनुराग और भक्तिभाव की चर्चा के लिए आधार प्रदान करता है। उनके श्रृंगारिक काव्य की प्रसिद्धि के साथ-साथ उनके धार्मिक पक्ष को भी उचित स्थान दिया जाना चाहिए, ताकि उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का संतुलित मूल्यांकन किया जा सके।
यह भी आवश्यक है कि ईसुरी के जीवन और साहित्य से जुड़े प्रसंगों का अध्ययन उपलब्ध रचनाओं, प्रामाणिक जीवन-वृत्तांतों और लोकपरम्पराओं के आधार पर किया जाए। उनके वृन्दावन प्रवास, उसकी अवधि और उस दौरान रचित फागों के संबंध में विशेष विवरण प्रस्तुत करते समय स्रोतों की पुष्टि करना उपयोगी होगा। इससे उनके साहित्य के धार्मिक पक्ष को अधिक विश्वसनीय और ऐतिहासिक दृष्टि से सुदृढ़ ढंग से समझा जा सकेगा।
निष्कर्ष
महाकवि ईसुरी की साहित्यिक यात्रा लोकजीवन के अनुभवों से आरम्भ होकर प्रेम, संवेदना और भक्ति के अनेक रूपों से गुजरती है। रजऊ-विषयक फागों ने उन्हें व्यापक प्रसिद्धि दिलाई, जबकि राधा-कृष्ण के प्रति अनुराग ने उनके साहित्य के धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष को समझने का अवसर दिया। वृन्दावन प्रवास से जुड़ा प्रसंग उनके जीवन में आत्मिक शान्ति की खोज और भक्ति की ओर बढ़ते झुकाव का प्रतीक बनकर सामने आता है।
‘महाकवि ईसुरी के राधे-श्याम’ केवल एक धार्मिक विषय नहीं, बल्कि लोककवि की भावनात्मक और आध्यात्मिक चेतना को समझने का माध्यम भी है। उनकी रचनाओं में प्रेम की संवेदना और भक्ति का समर्पण बुन्देली लोकभाषा की सहजता के साथ जुड़ते हैं। यही विशेषता ईसुरी को बुन्देली साहित्य की परम्परा में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है और उनके साहित्य के व्यापक अध्ययन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

अपनों तुम्हें जान गिरधारी, हमने कीनीं यारी।
काउ और से करने होती, बहुत हती संसारी।
हर-हर तरां तुमारे ऊपर, तबियत भरी हमारी।
तुलसी गंगा जामिन जाकी, जनम ज़िन्दगी हारी।
ईसुर तकी श्यामली मूरत, गोरी नई निहारी।
जिन पै किरपा होत तुमारी, अन्तस अधिक मुरारी।
गओ आसमान बाकी ठोक, इन्द्र तखत में भारी।
बड़े सूर सरई में बेदे, समर भूमि नई हारी।
दये उतार पील ऐरावत, ऐसी पाती डारी।
कोउ भओ न होने ईसुर, अर्जुन सो धनुधारी।
झूला झूलत श्याम उमंग में, कोउ नहीं है संग में।
मन ही मन बतरात खिलत हैं, फूले हैं अंग-अंग में।
झौंका लगत उड़त जौ अंबर,रंगे हैं केशर रंग में।
ईसुर कात बता दो हमका, रंगे कौन के रंग में।
इसे भी देखिए: ईसुरी के राम
महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri ने राधे-श्याम के दर्शन किए और उन्हीं के रंग में रंग गए। अपने तीन वर्ष के ब्रज प्रवास के दौरान उन्होंने श्रीकृष्ण-राधा के चरित्र पर सैकड़ों फागें लिखीं।
रेखा श्याम मंजनि काड़ी, मोय दुबीचें आड़ी।
भाल चन्द्रमा के ऊपर हो, मदकन ने लट छांड़ी।
ब्रज के लोगन के देवे खां, मानो जमुना बाड़ी।
सुखकर सुन्दर श्रीकृष्ण की, मुख पै मूरत ठांड़ी।
बलदाऊ घर बैठे ईसुर, हेरें कर पै डाड़ी।
बारे बनमाली का जाने, कई जसोदा मां ने।
जरती काये हमसो लालन, तुमें पड़े सिहाने।
मन आवै जितनी लै लेओ, जी खां जितनी चाने।
नौ लख धेनु नन्द बाबा के, जा में नई अगाने।
ईसुर ठाड़ी रात दुआरे, रोजउ देत उराने।
श्री कृष्णजी की बाल लीलाओं का चित्रण करते हुए महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri कहते हैं कि ब्रज बालाएँ कन्हैया की रोज-रोज शिकायतें करने आती हैं तो नंदरानी उनसे कहती हैं- अरी ग्वालनियों! तुम मेरे लल्ला के क्यों पीछे पड़ी रहती हो। वह बेचारा अभी नासमझ है, तुम लोग क्यों उसके पीछे पड़ी रहती हो। कन्हैया को माखन की कोई कमी तो है नहीं। उसके बाबा नंद जी के पास नौ लाख दुधारू गायें हैं, उसे कोई भूख पड़ी है क्या, जो तुम्हारा माखन छीनने जायेगा। तुम क्यों रोज-रोज उसको डराने के लिए दौड़ी आती हो। मेरा लल्ला तो बेचारा भोला-भाला है, वह क्या जाने ये छल-छद्म। गोपियाँ यशोदा जी से कहती हैं।
अपने बनमाली खां तासें, कओ जसोदा माँ से।
ले गओ दूध दई की दोनी, उठा हमारे ना से।
नई डरात पराये घर में, जाबै पैठ सुलासें।
मैं तो बूंद-बूंद जोरन, ऐसौ आय कहां से।
ईसुर छूट जात हातन से, हारी नन्द लला से।
राधा-कृष्ण की भक्ति से ओत-प्रोत महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri की फागें बहुत चर्चित हुई हैं और होली के समय इन फागों को लोग बड़ी उमंग के साथ गाते हैं।
मोय बल रात राधिका जी को,करैं आसरो की को।
दीनदयाल दूर दुख मेलत, जिनको मुख है नीको।
पैले पार पातकी कर दए, मोहन सौ पति जी को।
कैसे लगत खात सब कोऊ, खाद कात ना घी कौ ।
ईसुर कछू काम की जानों, कदमन के डिग झीको।
ऐसी मान्यता है कि यदि भक्त भगवान राम की कृपा पाना चाहता है तो उसे श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने से श्रीराम प्रसन्न होते हैं और उसी तरह यदि श्रीकृष्ण की कृपा चाहिए है तो श्रीराधा जी को प्रसन्न करना जरूरी है। इसी कारण से महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri ने श्रीकृष्ण की कृपा हेतु राधाजी की उपासना को माध्यम बनाने पर जोर दिया है।
जो काउ गुन गावे राधा को, जनम सफल हो ताको।
ऐसी नौनौ नाम लाड़ली, लेतन लगे मजाको।
ऐसो नौनौ गौनो कर दओ, अजामील गना को।
जेई भजन में पाप ईसुरी, हरे कोटि वाधा को।
महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri राधा जी की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहते हैं ।
जग में होत उजेरौ जी को, राधा कौ मुख नीकौ।
उतै हिरात परब हीरन की, कुन्दन कौ रंग फीकौ
जौ रंग रूप पाइए कांसे, विरन करेजौ झीकौ।
ईसुर सदा स्वाद वानो लय, सुकस सनेह अमी कौ
राधा जी के रूप सुन्दरता को बढ़ाने वाले गहनों की तारीफ करते हुए ईसुरी कहते हैं कि गहनों के धारण करने से राधा जी का रूप निखर रहा है और राधा जी के अंगों में पहनने से गहनों का महत्त्व बढ़ गया है।
कानन डुले राधिका जीके, लगे तरकुला नीके।
आनन्द कन्द चंद के ऊपर, दो तारागन झीके।
परतन पसर परत गालन पै, तरें झूमका जीके।
जिनके घर से जौ पैराऔ, और जनन ने सीके।
श्याम सनेह ईसुरी देखत, ब्रजवासी बस्ती के
राधा-श्रीकृष्ण से इतना प्यार करती थी कि उन्हें सदैव श्री कृष्ण के पास जाना,उनसे मिलना बातें करना अच्छा लगता था। जिस तरह गीत गोविन्द में जयदेव ने राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंगों, केलि-कथाओं तथा उनकी श्रृंगारिक अभिसार लीलाओं का रहस्यमय चित्रण किया है, उसी तरह महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri ने राधा-कृष्ण की प्रीति की रीति का वर्णन अपनी फागों के माध्यम से किया है।
राधा आउत जात कुंवारी, दई बेचन गिरधारी।
देउ अगोऊ गैल गोकुल की, मिल जै प्रानन प्यारी।
जांचो चलौ जान न पावै, जा सक की हुसियारी।
लेऊ चुकाय जगात जनम की, है माखन बेपारी।
ईसुर होत चोर की सौ लों, साउ की एक मुरारी।
राधा की सखी श्रीकृष्ण जी के पास जाकर कहती है कि हे माधव! हे केशव! आपके वियोग में राधा इतनी व्याकुल है कि वह अपना सब कुछ भूल गई है। वह इतनी दुबली-पतली हो गई है कि अपने गले में पहने हुए हार का बोझ भी सहन करने में सक्षम नहीं है। वह आपकी प्रतीक्षा में विह्नल है। वह आपके प्रेम में पागल सी होकर आपसे मिलने को घर से निकल पड़ी है।
राधा लाड़ करै गिरधर पै, रूपै न अपने घर पै।
उरझे से सुरझे ना नैना, जी कै पीताम्बर पै।
कोउ बात यो फार सामने, कै नई सकत जबर पै।
ईसुर जात मोह के बस में, सती चढ़ी सरबर पै।
महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri राधा को बहुत चतुर-स्यानी कहकर उनके सम्बंध में कहते हैं कि राधा जी ने श्रीकृष्ण को अपने प्रेमजाल में इस तरह फँसा रखा है। राधा-कृष्ण प्रसंग की फागों में इसुरी की यह फाग बड़ी सुन्दर बन गई है।
ऐसी चतुर राधका जी ने, तिरलोकी बस कीने।
जानौ सुनी बाह सई जाने, कई स्यावास सबीने।
जौन हते काउ के जाने, ते भये क्वाल नवीने।
बिलखत फिरत बनई बन व्याकुल,जादू से कर दीने।
बेदन कये गांय ना ईसुर, के रस कौन कबीने।
राधा और कृष्ण का प्यार हृदय की गहराई में जाकर था। जितना श्रीकृष्ण जी राधिका से प्यार करते थे, उतना ही राधा श्रीकृष्ण से। वे एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रहना चाहते थे।
नैना श्री वृषमान कुंवरि के, दरस लेत गिरधर के।
हैं के नई गुलाब फूल गए, बच्चा भूल भंवर के।
अंजन मुकुर कंज बन रंजन, रंजन बारे सरके ।
ईसुर तरन अरुन अलसाये, देखे बड़ी फजर के।
महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri ने राधा और कृष्ण के द्वारा होली खेले जाने का बड़ी रसमयता के साथ वर्णन किया है।
ब्रज में खेलें फाग कनाई, राधे संग सुहाई।
चलत अबीर रंग केशर को, नभ अरुनाई छाई।
लाल-लाल ब्रज लाल-लाल बन, बीथन कीच मचाई।
ईसुर नर नारिन के मन में, अति आनंद समाई।
भीजीं फिरैं राधिका रंग में, मन मोहन के संग में।
दूध की धूमर धाम मचाई, मजा उड़ावत मग में।
कोऊमाजूम धतूरा फांके, कोउ छका दह भंग में।
तन कपड़ा गए उगर ईसुरी, करी ढांक सब ढंग में।
केशव दई श्यामता अलिखां, गई बृषभान महल खां।
वारि पात जल जात मांग पर, मांजद खल के मल खां।
बेनिसिरी राधिका जू की, तिरबेनी के फल खां।
ईसुर तरन लगे जे पानी, जानौ का भई कलिखां।
दिन के मिलने हेतु सिधारी, श्री बृजभान कुमारी।
कुवले फूल कमल दल संपुट, निघा चकोरन डारी।
आवो भयो जात रई भीतर, मकरन्दन अंधियारी।
श्री बृजभान भुवन में ईसुर, दीपक देह दिवारी।
झूला झूलत श्याम उमंग में, कोउ नहीं है संग में।
मन ही मन बतरात खिलत हैं, फूले हैं अंग-अंग में।
झौका लगत उड़त जौ अम्बर, रंगे है केशर रंग में।
ईसुर कात बतादो हमकों, रंग कौन से रंग में।
जब वसुदेव जी बालकृष्ण को मथुरा के कैदखाने से ब्रज में नन्दबाबा के घर ले जा रहे थे, तब यमुना नदी को पार करते समय यमुना श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करने के लिए बढ़ रही हंै। वसुदेवजी प्रभु लीला को समझकर आगे बढ़ते जा रहे हैं और यमुना बड़े वेग के साथ उफान पर है। प्रभु ने यमुना का आशय समझकर अपनी टांग यमुना जल को स्पर्श करा दी ।यमुना प्रभु चरण स्पर्श से शीघ्र उतर गई और वसुदेव जी यमुना पार कर गए। ईसुरी ने इस दृश्य को अपनी फाग में प्रदर्शित किया है।
रेखा श्याम मंजनि काड़ी, मोय दुबीचें आड़ी।
भाल चन्दमा के ऊपर हो, मदकन ने लट छाड़ी।
ब्रज के लोगन के देवे खां, मानो जमुना बाड़ी।
सुखकर सुन्दर श्रीकृष्ण की, मुख पै मूरत ठाड़ी।
बलदाऊ घर बैठे ईसुर, डेरे कर पैं डाड़ी
गुइयां मन मोहन के मारें, जमुना गैल बिसारें।
जब देखौ तब खड़ौ कंज में, गए कदम की डारें।
गैल घाट को हँसो खेलबो, जा नई चाल हमारें।
रैबो कठिन हमारे ईसुर, जदु बंसिन के मारें ।
श्रीकृष्ण, इन्द्र के कार्य व्यवहार से अप्रसन्न थे। उन्होंने ब्रजवासियों से इन्द्र की वजाय गोवर्धन की पूजा करा दी। इन्द्र नाराज हो गये और ब्रज को बर्बाद करने के लिए घनघोर वर्षा करनी प्रारंभ कर दी। सात दिन रात भारी वर्षा कर ब्रज को डुबाने की चेष्टा में इन्द्र लगा था, किन्तु कृष्णजी ने अपनी एक अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और ब्रजवासियों की रक्षा की। महाकवि ईसुरी Mahakavi Isuri ने इसी दृश्य को अपनी फाग में वर्णन किया है।
बरसौ जा ब्रज में बैजावै, मेर्घइं इन्द्र सुनावैं।
सात दिना और सात रात लौ, बूंदें ग़म ना खावैं।
ब्रजबासिन के घर अंगना में, जल जमुना कौ धावै।
लओ उठा गोवरधन नख पै, छैल छत्र पर छावै।
कैसे मारे मरत ईसुरी, जिनको श्याम बचावै।
बा दिन बांसुरिया के सुरकी, बंशी कैसी मुरकी।
जौ भौ हाल कान से लगके, खाल फूट गई उरकी।
हाँ हो आई भनक के परतन, झाक विरह के जुरकी।
ईसुर भमां गए बहुतेरे, विष की दुरकन ढुरकी
सखीरी भाग हमारे भारी, हार गए गिरधारी।
दस और चार भुवन चैदा में, जिने भजत संसारी।
राम-कृष्ण में भेद कहां है, जिन गौतम तिय तारी।
पठये सुरग मरीच सुबाहू, तकत ताड़का मारी।
हैं गरीब के नाथ ईसुरी, दीनन के हितकारी।
गुइयां काके नाते गारी, देत
