Urag Ko Rachhro  उरग कौ राछरौ

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Urag Ko Rachhro  उरग कौ राछरौ
Urag Ko Rachhro  उरग कौ राछरौ

बुंदेलखण्ड  में कुछ ऐसे भी राछरे प्रचलित हैं, जो प्रेम-प्रधान हैं। उनकी दिशा पति-पत्नी के प्रेम और श्रंगार की ओर है। Urag Kau Rachhro  एक आदर्श और मार्ग-दर्शक उदाहरण है । जब रक युवक नैकारी की तलाश मे जाता है और उरग (फौज ) मे भर्ती हो जाता है और वहाँ उसे बहुत दिनों तक रुकना पड़ता है । 

बुन्देलखंड की लोक-गाथा उरग कौ राछरौ 

बुंदेलखंड का बुंदेली लोक-साहित्य एक अगाध महासागर के समान है, जिसमें अनेक बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। बुन्देली साहित्य में अनेक आदर्श-प्रधान, मार्गदर्शक और शिक्षाप्रद लोक उपन्यास  Fiction भरे पड़े हैं, जिनसे जन-जीवन को उपयोगी शिक्षा प्राप्त होगी। अभी तक बुंदेली के राछरों में वीरों के शौर्य का चित्रण  किया है।

हरण  प्रस्तुत किया, जो जन-जन के लिए एक अनुकरणीय  कथानक है।

राछरे का प्रमुख स्वरूप इस प्रकार है। कठिन उरग की चाकरी पति का पत्नी से कथन-
सबके उरगिया चले उरग खौं, तुमउं कहौ तौ  हम  जाय।
कछू दिनन कर चाकरी, धन उर धान्य कमाय।
कठिन उरग की चाकरी।

पुत्र का माँ से कथन-
बहुआ तुमारी नौंनी लाड़ली, छोड़त तुमरे अधार।
नैंन पुतरियँन राखियों, दै बिटियँन सौ दुलार।
कठिन उरग की  चाकरी।

माँ के वचन-
जाव-जाव बेटा उरग कर आवो, सम्पत ल्याव कमाय।
तुमरी दुलरिया गले की दुलनियां, राखौं संवार-संवार।
लला मोरे कठिन उरग की चाकरी।

पति उरग को प्रस्थान कर जाता है, तब सास का छल-छद्म प्रकट होने लगता है-
सासो ने हँड़िया में, छौंक लगां दये करिया नाग।
खा लो मोरी बहुआ, लला तुम जाइयों पाइयो।
इस गाथा में सास की कुटिलता के दर्शन हो रहे हैं। समाज में सास-बहू की अनबन के उदाहरण भरे पड़े हैं। श्रवण  कुमार लोकगाथा में अपनी कुल्टा-पत्नी के कुटिल व्यवहार के कारण श्रवण कुमार को अपने अंधे माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थ यात्रा को जाना पड़ा था।

इस गाथा में वर्णित सास का आचरण कितना निंदनीय है, जिसके मन में अपनी एक मात्र भोली-भाली पुत्र-वधू की हत्या करके पुत्र का कल्याण चाह रही हैं। अंत में वे अपनी पुत्र-वधू और पुत्र से हाथ धो बैठती हैं। ऐसी माता को माता कहना उचित नहीं है। ऐसी माताएँ निंदनीय और दण्डनीय हैं। सर्प को खा लेने वाली बहू मोरी कठिन उरग की चाकरी। उससे आदमी कैसे बच सकता था?
खातन प्रान तजे बहूरानी, आये उरगिया फेर।
सासो जू बोली रिसानी परी हैं।
धनियां तुमारी कुबेर।

देखिये! माता कितनी कपटिनी है? जो अपने पुत्र से झूठ बोल रही है। जान-बूझकर विष खिलाकर पुत्र वधू को मार डाला और पुत्र के सामने झूठ बोल रही है। ऐसी माताएँ नागिन की श्रेणी में आती हैं।

पुत्र वचन लौटकर आने पर-
लला मोरे कठिन उरग की चाकरी।
पानी न पीहौं न खैहों मताई। दैहों धना संग प्रान।

माता वचन-
पानी पियो बेटा, भोजन करौ तुम, दूजी धना दैहों आन।
लला मोरे कठिन उरग की चाकरी।

पुत्र एक पत्नीव्रत था। वह कहता है-
दूजी धना कौ कहा करौ माई।
ऐई संग दैहों प्रान।
सात भंवरिया कौ बाँधौ वचन मैं।
पूरौ करो परमान हो माता।

नायक भी अंत में वह अपनी पत्नी के साथ ही प्राण त्याग देता है। एक ही चिता पर उन दोनों की अन्त्येष्टि हो जाती है। इस प्रकार धना का पति अपनी धनियां के साथ ‘सता’ होकर एक आदर्श प्रस्तुत करता है।

सत्ता-सत्ती जगत भये जाहर, सबरन खौं देव सुहाग।
चीरन उरग उरगिया खुदा दये, अमर भये अनुराग हो माता।
कठिन उरग की चाकरी।

इस राछरे में दाम्पत्य-प्रेम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। एक पति प्राण -त्यागकर निश्छल पत्नी व्रत का उत्तम आदर्श प्रस्तुत करता है। सत्ता-सत्ती के वास्तविक स्वरूप को समाज के समक्ष रखना आवश्यक है, जिससे लोग उसके वास्तविक मूल्य को समझ सकें। प्रायः निःसंतान पुत्र-वधुओं का अपमान हुआ करता है।

उरगिया की पत्नी निःसंतान थी। इसी कारण से उसकी सास ने उसे विष खिलाकर मार डाला था। हालाँकि यह घटना सामाजिक दृष्टि से अशोभनीय थी। उसने अपने पुत्र के साथ घोर अविश्वास किया था। जो एक माता के लिए निन्दनीय कार्य है। ऐसे प्रेम की भावना बुंदेली काव्य में बहुत कम दिखाई देती है।

संदर्भ-
बुंदेलखंड दर्शन- मोतीलाल त्रिपाठी ‘अशांत’
बुंदेली लोक काव्य – डॉ. बलभद्र तिवारी
बुंदेलखंड की संस्कृति और साहित्य- रामचरण हरण ‘मित्र’
बुंदेली लोक साहित्य परंपरा और इतिहास- नर्मदा प्रसाद गुप्त
बुंदेली संस्कृति और साहित्य- नर्मदा प्रसाद गुप्त

बुन्देली झलक (बुन्देलखण्ड की लोक कला, संस्कृति और साहित्य)