चंदेल काल में लोकसंस्कार, अनुष्ठान, त्यौहार और लोकोत्सव में लोक चित्रों के आलेखन होते थे । लोक कथाओं और पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर कई लोकचित्रों का रेखांकन किया गया है। जिस प्रकार लोककथाओं के कथानक कोई न कोई संदेश देते हैं, Chandel Kalin Lok Chitrakala इन लोकचित्रों में भी आदर्श की निहिति रहती हैं। लेकिन उनका अर्थ वही समझ सकता है, जो उनके अभिप्रायों और प्रतीकों से परिचित हो।
लोकचित्रों में बिन्दु, रेखा, त्रिभुज, आयत, वर्ग, वृत्त, कोण आदि का प्रयोग होता है और उनके संकेतात्मक अर्थ होते हैं। यहाँ तक कि सीधी और लहरियादार रेखा के अर्थ भिन्न होते हैं। प्राकृतिक वनस्पति में फूल-पत्ते, तुलसी, बेलें आदि पशु-पक्षियों में हाथी, घोड़ा, मोर, तोता, साँप, बिच्छू, चिड़िया आदि और सांस्कृतिक प्रतीकों स्वस्तिक, शंख, चक्र, श्रवणकुमार आदि को भी चित्र की कथा के अनुरूप समझना उचित है।
लोकचित्रों का वर्गीकरण लोकसंस्कारों, विषय, माध्यम और आधारभूमि के आधार पर किया जा सकता है, पर यहाँ हम आधारभूमि के अनुसार वर्गीकरण कर रहे हैं:-
1 – भूमिचित्र: भूमि या धरती पर बनाये जाने वाले लोकचित्र।
2 – भित्तिचित्र: भित्ति (भींत या दीवार) पर बनाये जानेवाले लोकचित्र।
3 – पटचित्र: कागज, कपड़ा, पत्ता आदि पर बनाये जानेवाले लोकचित्र।
4 – देहचित्र: मेंहदी, महावर और गोदने से बने लोकचित्र।
चंदेल काल में सबसे पुराने पारम्परिक देहचित्र हैं, जो बुंदेलखण्ड में बसने-वाली आदिम जनजातियों गोड़ों और सौंरों (सहरियों) के गुदनों में मिलते हैं। गोंड़ होशंगाबाद, सागर, दमोह आदि जिलों में रहते हैं। गोंड़ों की मान्यता है कि गुदना स्त्री के सच्चे आभूषण हैं, जो मृत्यु होने पर उसके साथ जाते हैं।
दूसरे, देवताओं को प्रसन्न करने और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए गुदना गुदवाना जरूरी है। गोंड़ स्त्रियाँ गुदनों को सौभाग्य का प्रतीक मानती हैं, इसलिए वे बाँह, हाथ, पोंहचा, मस्तक, छाती, पैर आदि शरीर के विभिन्न अंगों में गुदनों के परम्परित रूपाकारों को ही गुदवाती हैं।
गोंड पुरुष उतने गुदने नहीं गुदवाते। बाँह पर फूल, बिरछा, सीताफल, माछी, मुरागा, दोहरी, जोहरा, टिपका, चूल्हा आदि, पोंहचा में पोथी, अद्धा, बिरछा, करलिया आदि, छाती पर पुतरिया, टिपका, चूल्हा आदि, पैरों में घोड़ा, मुरागा, पोथी, फूल, मुरला, पुतरिया बिछी (बिच्छू) आदि को परम्परागत रूप में गुदवाते हैं।
सौंर स्त्रियाँ कपाल पर टीका (अर्द्धचंद्र और बीच में बिन्दी) सात-आठ वर्ष की आयु में, फिर बाहें नथुने पर चार दाणा त्रिभुजाकार, कनपटी के दोनों ओर मंदिर के कलश के रूपाकार में सात दाणा और ठुड्डी पर एक गोल दाणा गुदवाती हैं। कपोल पर तिल के रूप में, मुट्ठी पर सीता चौक, सीता नन्ही, मुठी फूल, हथफूल, सूरज, चाँदतारा और चोमल, हाथ पर सीता का हाथ, सीता रसोई, सीता बावड़ी, मयूर जोड़ी, गूजरी और देवर-भौजाई, बाँह पर चुरिया तथा पिंडलियों पर मछली या मछली काँटा गुदवाने की परम्परा है।
उत्कृष्ट गुदनों में चुरिया अग्रणी है, जिसमें सिंहासन, सूरज, अश्वजोड़ी, फूल, छत्र और दाने का सामूहिक अंकन ही चुरिया कहलाता है। सिंहासन धरती का, सूरज ग्रहों का, अश्व शक्ति का, फूल प्रसन्नता का, छत्र आकाश का एवं दाने अनाज की समृद्धि का प्रतीक है।
खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह की परिक्रमा के पीछे की तरफ फाग के दृश्यों का अंकन है, जिससे होली उत्सव की लोकप्रियता स्पष्ट है। दीपावली में कमल चौक, जन्माष्टमी में फूल चौक और देवउठनी एकादशी में चरण चौक पूरने की परम्परा आज भी चली आ रही है। क्वाँर की अष्टमी और महानवमी के दिन देवी-पूजन के हैं, जब नौरता में भी चौक पूरे जाते हैं। उन चौकों में स्वस्तिक, शंख, चक्र, आदि के चौक प्रमुख थे।
भित्ति चित्रों में दीपावली पर ’सुरातू’, नौरता खेल में ’दानव‘ या ’दैत्य‘, दोज पर भाई-दूज के लोकचित्र लिखे जाते हैं। ’रूपकषटकम्‘ (रुक्मि.), पृ. 59 पर ’आलेखन‘ और पटचित्र (चित्रपट) का प्रयोग हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि लोकचित्रों का आलेखन होता था और पटचित्र भी लिखे जाते थे।
लोकमहाकाव्य ’आल्हा‘ की हर गाथा में ’ऐपनबारी‘ शब्द आया है। विवाह में ’ऐपनादि‘ भेजने की रस्म को ’ऐपनबारी‘ कहते हैं, इसलिए ’ऐपनबारी‘ ले जाना चंदेल-काल में प्रचलित था।