भारतीय संस्कृति में मूर्तिकला का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह भारत की प्राचीन कलात्मक प्रतिभा, धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक जीवन, दार्शनिक चिंतन और सौंदर्यबोध की सशक्त अभिव्यक्ति है। भारत में मूर्तिकला की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। प्रागैतिहासिक काल के शैलाश्रयों से लेकर सिंधु घाटी सभ्यता, मौर्यकाल, शुंग-सातवाहन काल, कुषाणकाल, गुप्तकाल और मध्यकालीन मंदिरों तक मूर्तिकला के विकास के अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं।
सामान्य अर्थ में किसी व्यक्ति, पशु, देवता, प्राकृतिक वस्तु अथवा कल्पित रूप को ठोस आकार देकर निर्मित की गई कलाकृति को मूर्ति कहा जाता है। जब कलाकार पत्थर, धातु, लकड़ी, मिट्टी, हाथीदाँत अथवा अन्य सामग्री को कलात्मक रूप प्रदान करता है, तब उसकी रचना मूर्तिकला कहलाती है। मूर्तिकला में आकृति, अनुपात, संतुलन, भावाभिव्यक्ति, मुद्रा, अलंकरण और माध्यम का विशेष महत्त्व होता है।
प्राचीन भारतीय मूर्तिकार केवल बाहरी रूप की नकल नहीं करते थे, बल्कि वे अपने विषय के भीतर निहित भाव, शक्ति, करुणा, शांति, वीरता और आध्यात्मिकता को भी अभिव्यक्त करने का प्रयास करते थे। इसी कारण भारतीय मूर्तिकला में यक्ष-यक्षिणियों की शारीरिक शक्ति, बुद्ध की ध्यानमग्न शांति, तीर्थंकरों की वीतराग मुद्रा,विष्णु की दिव्य गरिमा, शिव के विविध रूप तथा मंदिरों की अलंकृत आकृतियाँ देखने को मिलती हैं।
भारतीय मूर्तिकला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विविधता और निरंतरता है। समय के साथ इसके रूप, तकनीक और विषय बदलते रहे, परंतु प्रत्येक युग ने अपनी सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप मूर्तिकला को समृद्ध किया।
प्रागैतिहासिक काल में मूर्तिकला के आरंभिक संकेत
भारतीय उपमहाद्वीप में कलात्मक अभिव्यक्ति के प्रमाण प्रागैतिहासिक काल से मिलने लगते हैं। इस काल में मनुष्य ने अपने आसपास के पशुओं, प्राकृतिक वस्तुओं और जीवन की घटनाओं को चित्रित करने के साथ-साथ छोटी आकृतियाँ बनाने की कला भी विकसित की। हालाँकि प्रागैतिहासिक काल की मूर्तिकला के प्रमाण अपेक्षाकृत सीमित हैं, फिर भी उपलब्ध पुरावशेष यह बताते हैं कि मानव समुदायों में आकार निर्माण और वस्तुओं को कलात्मक रूप देने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी थी।
प्रागैतिहासिक मनुष्य का जीवन प्रकृति और पशु-जगत से गहराई से जुड़ा हुआ था। इसलिए आरंभिक कलात्मक वस्तुओं में पशुओं, मानव आकृतियों और उपयोगी वस्तुओं के रूपों का महत्त्व रहा। इन आकृतियों का उद्देश्य धार्मिक, अनुष्ठानिक, प्रतीकात्मक अथवा व्यावहारिक हो सकता था, लेकिन प्रत्येक वस्तु का निश्चित प्रयोजन बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
मध्य प्रदेश के भीमबेटका सहित अनेक शैलाश्रयों में प्राचीन मानव की कलात्मक गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं। यद्यपि वहाँ की प्रसिद्ध कला मुख्यतः शैलचित्रों के रूप में है, फिर भी वह उस व्यापक कलात्मक परंपरा को समझने में सहायता करती है जिसके अंतर्गत मानव ने अपने अनुभवों को दृश्य रूप देना आरंभ किया।
सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला
भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में सिंधु घाटी सभ्यता का विशेष स्थान है। लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में विकसित हड़प्पा सभ्यता के नगरों से पत्थर, धातु, मिट्टी और अन्य सामग्रियों से निर्मित अनेक कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो और अन्य पुरातात्त्विक स्थलों से मिली मूर्तियाँ तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, कलात्मक कल्पना और सौंदर्यबोध का परिचय देती हैं।
(A) पाषाण मूर्तियाँ
सिंधु सभ्यता से प्राप्त पत्थर की मूर्तियों में एक प्रसिद्ध पुरुष प्रतिमा का उल्लेख किया जाता है, जिसे सामान्यतः ‘पुरोहित-राजा’ कहा जाता है। यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी। इसमें एक पुरुष को उत्तरीय जैसा वस्त्र धारण किए हुए दिखाया गया है। वस्त्र पर त्रिपत्र अथवा तीन पत्तियों जैसे अलंकरण दिखाई देते हैं। चेहरे पर गंभीरता, आँखों की बनावट और सिर तथा दाढ़ी के विन्यास में सूक्ष्मता दिखाई देती है।
‘पुरोहित-राजा’ इसका आधुनिक प्रचलित नाम है; यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है कि प्रतिमा में चित्रित व्यक्ति वास्तव में पुरोहित, राजा अथवा किसी अन्य सामाजिक पद का अधिकारी था। इस प्रतिमा का महत्त्व इसके नाम से अधिक इसकी कलात्मक विशेषताओं में निहित है।
सिंधु सभ्यता से प्राप्त मानव आकृतियों में चेहरे, केश-विन्यास, वस्त्र और शारीरिक गठन को दर्शाने के अलग-अलग तरीके मिलते हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि हड़प्पाई कलाकारों को मानव शरीर के चयनित अंगों और विशिष्ट लक्षणों को उभारने का अच्छा ज्ञान था।
(B) धातु मूर्तियाँ
सिंधु सभ्यता की धातु मूर्तियों में मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी की प्रतिमा अत्यंत उल्लेखनीय है। यह छोटी प्रतिमा एक युवती को सहज और आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा में खड़े हुए दिखाती है। उसके एक हाथ में अनेक चूड़ियाँ हैं और दूसरे हाथ की मुद्रा भी विशिष्ट है। शरीर का संतुलन, हाथों की स्थिति तथा आकृति की सजीवता इसे प्राचीन भारतीय धातु-कला का उत्कृष्ट उदाहरण बनाती है।
इस प्रतिमा के निर्माण में धातु ढलाई की उन्नत तकनीक का प्रयोग हुआ था। इससे पता चलता है कि हड़प्पाई कारीगर धातुओं को गलाने, साँचे अथवा अन्य ढलाई प्रक्रियाओं से आकार देने और छोटी आकृतियों को सूक्ष्मता से निर्मित करने में दक्ष थे।
सिंधु सभ्यता की धातु कला में पशु आकृतियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। ताँबे और कांसे से बनी विभिन्न वस्तुएँ उस समय के धातु-ज्ञान तथा शिल्प परंपरा की जानकारी देती हैं।
(C) मिट्टी की मूर्तियाँ और खिलौने
हड़प्पा सभ्यता में पकी तथा कच्ची मिट्टी से निर्मित मूर्तियों और खिलौनों का व्यापक प्रचलन था। इनमें मानव आकृतियाँ, पशु-पक्षी, गाड़ियाँ और अन्य छोटे रूप शामिल हैं। कुछ खिलौनों में पहियों का प्रयोग हुआ है, जो तत्कालीन तकनीकी कौशल और दैनिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
स्त्री आकृतियों को प्रायः मातृदेवी से जोड़कर देखा गया है। किंतु प्रत्येक स्त्री-मूर्ति को निश्चित रूप से देवी की प्रतिमा मानना उचित नहीं है, क्योंकि उनका वास्तविक प्रयोजन पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। संभव है कि इनमें धार्मिक, घरेलू, प्रतीकात्मक तथा अन्य प्रकार के उपयोग सम्मिलित रहे हों।
सिंधु सभ्यता की मूर्तिकला की प्रमुख विशेषताएँ हैं—आकृतियों में सरलता, सीमित आकार में प्रभावशाली अभिव्यक्ति, पशुओं के स्वरूप का सूक्ष्म निरीक्षण, धातु ढलाई का ज्ञान तथा मिट्टी से विविध वस्तुओं का निर्माण। इस कला ने भारतीय उपमहाद्वीप की आरंभिक शिल्प परंपराओं को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
मौर्यकालीन मूर्तिकला
मौर्य साम्राज्य के उदय के साथ भारतीय मूर्तिकला को व्यापक राजकीय संरक्षण मिला। विशेष रूप से सम्राट अशोक के शासनकाल में स्तंभों, स्तूपों और अन्य स्मारकों के निर्माण ने मूर्तिकला के विकास को नई दिशा प्रदान की। मौर्यकालीन कला में विशालता, संतुलन, तकनीकी दक्षता और पत्थर की सतह को चमकदार बनाने की विशिष्ट शैली दिखाई देती है।
(A) अशोक स्तंभ और उनके शीर्ष
अशोक के स्तंभ भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखते हैं। ये स्तंभ सामान्यतः एक ही पत्थर के खंड से निर्मित होते थे। इनके चिकने स्तंभदंड और सुडौल शीर्ष तत्कालीन शिल्पियों की उच्च तकनीकी क्षमता का परिचय देते हैं।
सारनाथ का सिंहशीर्ष मौर्यकालीन कला की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृतियों में से एक है। इसमें चार सिंहों को पीठ से पीठ मिलाकर खड़ा दिखाया गया है। उनके नीचे स्थित गोलाकार भाग पर हाथी, घोड़ा, वृषभ और सिंह जैसे पशुओं तथा धर्मचक्र का अंकन है। इसकी रचना में शक्ति, गरिमा, संतुलन और प्रतीकात्मकता का सुंदर समन्वय है।
सारनाथ के सिंहशीर्ष को भारत के राजकीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया है। इसका मूल कलात्मक महत्त्व केवल इसकी भव्यता में नहीं, बल्कि इसकी उत्कृष्ट शिल्प-योजना और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति में भी है।
रामपुरवा से प्राप्त वृषभशीर्ष भी मौर्यकालीन मूर्तिकला का उल्लेखनीय उदाहरण है। इसमें वृषभ के शरीर, मांसपेशियों और मुद्रा को स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत किया गया है। पशु आकृतियों का ऐसा सजीव अंकन बताता है कि कलाकारों ने प्रकृति का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया था।
मौर्य स्तंभों के कुछ स्थापत्य रूपों और अलंकरणों में आचमेनिड ईरानी कला से समानताएँ दिखाई देती हैं। इन समानताओं को प्राचीन भारत और पश्चिमी एशिया के सांस्कृतिक संपर्कों के संदर्भ में समझना चाहिए। फिर भी मौर्य कला को किसी एक विदेशी परंपरा की नकल मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसमें स्थानीय कलात्मक दृष्टि और भारतीय प्रतीक-परंपरा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था।
(B) मौर्यकालीन पॉलिश और शिल्प-कौशल
मौर्यकालीन पत्थर की कुछ मूर्तियों तथा स्तंभों पर अत्यंत चमकदार पॉलिश दिखाई देती है। पत्थर की सतह को इतना चिकना बनाना उस समय की विकसित तकनीक का प्रमाण है। इस चमकदार सतह के कारण आकृतियाँ प्रकाश में विशेष प्रभाव उत्पन्न करती हैं।
मौर्यकालीन कला में राजकीय शक्ति, नैतिक आदर्श और धार्मिक संदेशों का समन्वय दिखाई देता है। अशोक के स्तंभ केवल स्थापत्य संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि उन पर अंकित अभिलेखों और शीर्षों के माध्यम से वे शासन तथा नैतिक नीति के संदेश भी प्रसारित करते थे।
(C) दीदारगंज यक्षी
पटना के दीदारगंज से प्राप्त चामरधारिणी यक्षी भारतीय मूर्तिकला की प्रसिद्ध प्रतिमाओं में गिनी जाती है। यह प्रतिमा एक स्त्री को हाथ में चामर धारण किए हुए दिखाती है। इसके शरीर का संतुलन, वस्त्रों का विन्यास, आभूषणों की प्रस्तुति और चमकदार सतह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इस प्रतिमा की तिथि और इसे निश्चित रूप से मौर्यकालीन मानने के विषय में विद्वानों के बीच मतभेद रहे हैं। इसलिए इसका उल्लेख करते समय इसे मौर्य अथवा मौर्योत्तर आरंभिक यक्षी-परंपरा के संदर्भ में सावधानीपूर्वक देखना चाहिए। इसकी कलात्मक महत्ता निर्विवाद रूप से अत्यंत अधिक है।यक्ष और यक्षिणी मूर्तियों की परंपरा
प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में यक्ष और यक्षिणी प्रतिमाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यक्ष-यक्षिणियाँ भारतीय धार्मिक और लोकविश्वासों में प्रकृति, उर्वरता, समृद्धि, धन तथा रक्षक शक्तियों से संबंधित माने जाते रहे हैं। इनकी मूर्तियाँ भारतीय लोकधार्मिक परंपराओं और प्रारंभिक प्रतिमा-निर्माण की विशेषताओं को समझने में सहायता करती हैं।
मथुरा के निकट परखम से प्राप्त विशाल यक्ष प्रतिमा इस परंपरा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी देहयष्टि भारी, शक्तिशाली और प्रभावशाली है। प्रतिमा का समग्र स्वरूप शरीर की दृढ़ता और महाकायता पर बल देता है। ऐसी मूर्तियों में शरीर के मांसल अंग, चौड़े कंधे और स्थिर मुद्रा विशेष रूप से उभारे जाते थे।
यक्ष मूर्तियों की शैली में आदर्शीकृत शारीरिक शक्ति दिखाई देती है। इनमें बाद की बुद्ध प्रतिमाओं जैसी ध्यानमग्न आध्यात्मिक शांति सामान्यतः प्रमुख नहीं होती, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इन मूर्तियों में कोई धार्मिक या प्रतीकात्मक गहराई नहीं थी। इनका अपना धार्मिक संदर्भ और विशिष्ट कलात्मक उद्देश्य था।
यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं का प्रभाव बाद की भारतीय मूर्तिकला में भी दिखाई देता है। वृक्षों के साथ खड़ी स्त्रियों, शालभंजिकाओं और मंदिरों की अलंकृत आकृतियों में प्रकृति, सौंदर्य तथा उर्वरता से जुड़े अनेक पुराने कलात्मक भाव विकसित रूप में दिखाई देते हैं।
शुंग-सातवाहन काल की मूर्तिकला
मौर्यकाल के बाद शुंग, सातवाहन और अन्य क्षेत्रीय राजवंशों के समय में स्तूपों, वेदिकाओं, तोरणों और धार्मिक स्मारकों पर मूर्तिकला का व्यापक विकास हुआ। इस काल की कला में कथात्मक दृश्य, लोकजीवन, धार्मिक प्रतीक और प्रकृति के विविध रूप प्रमुख हैं।
(A) भरहुत की मूर्तिकला
मध्य प्रदेश स्थित भरहुत स्तूप की वेदिका और रेलिंगों पर अनेक सुंदर उत्कीर्णन प्राप्त हुए हैं। इनमें जातक कथाएँ, बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रसंग, वृक्ष, पशु, यक्ष-यक्षिणियाँ और अन्य धार्मिक प्रतीक शामिल हैं।
भरहुत की कला में कथात्मकता विशेष रूप से दिखाई देती है। कलाकारों ने सीमित स्थान में अनेक पात्रों और घटनाओं को संयोजित किया। अभिलेखों से कुछ आकृतियों तथा कथाओं की पहचान करने में भी सहायता मिलती है।
भरहुत की मूर्तियों में स्थानीय जीवन, धार्मिक आस्था और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का समन्वय है। आकृतियों के साथ नाम अथवा कथात्मक संकेतों का अंकन इस कला की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
(B) साँची स्तूप की मूर्तिकला
मध्य प्रदेश का साँची स्तूप भारतीय बौद्ध कला का प्रमुख केंद्र है। यहाँ के स्तूपों के तोरणों और वेदिकाओं पर उत्कीर्ण दृश्य प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की कथात्मक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
साँची के तोरणों पर बुद्ध के जीवन से जुड़े प्रसंग, जातक कथाएँ, हाथी, घोड़े, सिंह, मोर, वृक्ष, कमल, स्तूप, यक्ष-यक्षिणियाँ और अनेक लोकजीवन संबंधी दृश्य अंकित हैं। कुछ दृश्यों में जुलूस, पूजा, यात्राएँ और नगरों के दृश्य भी दिखाई देते हैं।
इन उत्कीर्णनों में पशुओं की गति, वृक्षों की शाखाओं, मानव समूहों और स्थापत्य संरचनाओं का कुशल संयोजन मिलता है। शिल्पियों ने कथा को केवल एक दृश्य तक सीमित न रखकर कई बार एक ही पटल पर विभिन्न घटनाओं को प्रस्तुत किया।
प्रारंभिक बौद्ध कला की एक विशेषता यह है कि भरहुत और साँची के अनेक दृश्यों में बुद्ध को मानव आकृति के रूप में प्रदर्शित करने के बजाय धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, रिक्त सिंहासन, चरणचिह्न या स्तूप जैसे प्रतीकों के माध्यम से उनकी उपस्थिति का संकेत मिलता है। इसे प्रारंभिक बौद्ध कला की प्रतीकात्मक परंपरा के रूप में समझा जाता है। इसके कारणों और अर्थों पर विद्वानों में विभिन्न मत हैं।
(C) अमरावती की मूर्तिकला
आंध्र प्रदेश स्थित अमरावती बौद्ध मूर्तिकला का एक प्रमुख केंद्र था। यहाँ के स्तूप से प्राप्त उत्कीर्ण पट्टों में बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों और विविध मानव समूहों के दृश्य मिलते हैं।
अमरावती कला में आकृतियों की गतिशीलता, शरीर की लचक, वस्त्रों का सूक्ष्म अंकन और सजावटी रचनाओं का विशेष महत्त्व है। यहाँ की मूर्तियों में शारीरिक मुद्राओं और कथात्मक दृश्यों को अपेक्षाकृत अधिक गतिशील रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अमरावती की मूर्तिकला दक्षिण भारत की धार्मिक और कलात्मक परंपराओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके शिल्पगत प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य क्षेत्रों और समुद्रपारीय बौद्ध कला के अध्ययन में भी उपयोगी हैं।
कुषाणकालीन मूर्तिकला: गांधार और मथुरा शैली
कुषाणकाल में भारतीय मूर्तिकला ने उल्लेखनीय विकास किया। इस समय बुद्ध, बोधिसत्त्वों, जैन तीर्थंकरों तथा विभिन्न देवी-देवताओं की मानवाकृतियों वाली प्रतिमाओं का व्यापक निर्माण हुआ। गांधार और मथुरा दो प्रमुख कलाकेंद्र के रूप में विकसित हुए। दोनों शैलियों में धार्मिक विषय समान होने पर भी उनकी प्रस्तुति, सामग्री, शारीरिक गठन और वस्त्र-विन्यास में अंतर दिखाई देता है।
(A) गांधार शैली
गांधार क्षेत्र प्राचीन उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप में स्थित था। वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्र इसके ऐतिहासिक सांस्कृतिक भूगोल से संबंधित थे। इस क्षेत्र में भारतीय, ईरानी, मध्य एशियाई और यूनानी-रोमन परंपराओं के संपर्कों ने एक विशिष्ट कला-शैली के विकास में योगदान दिया।
गांधार शैली में बुद्ध और बोधिसत्त्वों की अनेक प्रतिमाएँ निर्मित की गईं। इन प्रतिमाओं में लहरदार केश, स्पष्ट चेहरे की बनावट, गहरी आँखें, व्यवस्थित वस्त्र-वलय और शरीर के अंगों का अपेक्षाकृत प्राकृतिक अंकन दिखाई देता है। वस्त्रों की सिलवटों को विशेष विस्तार से दिखाया गया है।
गांधार कला में बुद्ध को कभी खड़े हुए, कभी बैठे हुए और कभी ध्यानमग्न मुद्रा में प्रस्तुत किया गया। उनके चेहरे पर गंभीरता, करुणा और शांति का भाव उभरता है। बोधिसत्त्व प्रतिमाओं में आभूषण, मुकुट तथा राजसी वस्त्रों का प्रयोग मिलता है।
गांधार शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1- बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मानवाकृति वाली प्रतिमाओं का व्यापक निर्माण।
2- वस्त्रों की सिलवटों का सूक्ष्म और यथार्थपरक अंकन।
3- चेहरे, केश और शरीर के अंगों को स्पष्ट रूप से उभारना।
4- बुद्ध के जीवन तथा जातक कथाओं के दृश्यात्मक पटल।
5- स्थापत्य और सजावटी रूपांकनों में विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं का समन्वय।
6- शिल्प में गंभीरता, गरिमा और कथात्मक अभिव्यक्ति।
गांधार कला को केवल यूनानी अथवा रोमन कला की नकल मानना उचित नहीं है। इसमें विदेशी कलात्मक प्रभावों के साथ भारतीय धार्मिक विषयों और स्थानीय शिल्प-परंपराओं का सशक्त समन्वय हुआ।
(B) मथुरा शैली
उत्तर भारत में मथुरा प्राचीन काल से एक प्रमुख कलाकेंद्र था। यहाँ लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर का उपयोग करके अनेक बुद्ध, बोधिसत्त्व, जैन तीर्थंकर, यक्ष-यक्षिणी तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाई गईं।
मथुरा शैली की जड़ें स्थानीय यक्ष परंपरा और पूर्ववर्ती भारतीय मूर्तिकला में दिखाई देती हैं। इस शैली में शरीर की दृढ़ता, चौड़ा वक्ष, प्रभावशाली शारीरिक गठन और प्रतिमा की सामने की ओर केंद्रित मुद्रा प्रमुख हैं। चेहरे की अभिव्यक्ति तथा वस्त्र-विन्यास में भी इसकी अपनी विशेषता है।
मथुरा शैली में बुद्ध की प्रतिमाएँ प्रायः ऐसी मुद्रा में बनाई गईं जिनमें शारीरिक उपस्थिति और आध्यात्मिक गरिमा दोनों का समन्वय मिलता है। जैन तीर्थंकरों की ध्यानमग्न तथा खड़ी हुई प्रतिमाएँ भी यहाँ बड़ी संख्या में निर्मित हुईं।
मथुरा की जैन कला में आयागपट्ट विशेष महत्त्व रखते हैं। ये पूजा और धार्मिक अर्पण से संबंधित उत्कीर्ण पत्थर की पट्टिकाएँ थीं। इन पर स्तूप, धर्मचक्र, कमल, शुभ चिह्न तथा अन्य प्रतीकों का अंकन मिलता है। इनसे जैन धार्मिक जीवन, प्रतीक-परंपरा और पूजा-पद्धति की जानकारी प्राप्त होती है।
मथुरा शैली में विभिन्न धर्मों की मूर्तियों का निर्माण यह दर्शाता है कि नगर एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक तथा कलात्मक केंद्र था। यहाँ की प्रतिमा-निर्माण परंपरा ने उत्तर भारत की बाद की मूर्तिकला को भी प्रभावित किया।
(C) गांधार और मथुरा शैली का तुलनात्मक अध्ययन
गांधार और मथुरा दोनों शैलियों ने बुद्ध की प्रतिमा को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों में समान धार्मिक विषयों के बावजूद शिल्पगत भिन्नताएँ स्पष्ट हैं।
गांधार शैली में वस्त्रों की सिलवटें, चेहरे का विस्तृत अंकन और बाहरी शारीरिक रूप का प्राकृतिक चित्रण विशेष रूप से दिखाई देता है। इसके विपरीत मथुरा शैली में शरीर की दृढ़ता, प्रतिमा की प्रभावशाली उपस्थिति और स्थानीय भारतीय परंपरा से जुड़ी आकृति-रचना प्रमुख है।
इन दोनों शैलियों के विकास को किसी एक केंद्र की पूर्ण विजय अथवा दूसरे के प्रभावहीन हो जाने के रूप में नहीं देखना चाहिए। दोनों ने भारतीय मूर्तिकला को अलग-अलग कलात्मक दृष्टियाँ प्रदान कीं और आगे चलकर अनेक क्षेत्रीय शैलियों के विकास में योगदान दिया।
कुषाणकाल में सनातन और जैन मूर्तिकला
कुषाणकाल में बौद्ध मूर्तिकला के साथ-साथ जैन और सनातन धार्मिक परंपराओं की प्रतिमाओं का भी विकास हुआ। मथुरा से विष्णु, शिव तथा अन्य देवताओं से संबंधित प्रारंभिक प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इनसे देवप्रतिमा निर्माण की परंपरा के विकास का संकेत मिलता है।
जैन कला में तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का निर्माण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था। इन प्रतिमाओं में कायोत्सर्ग अर्थात खड़ी ध्यानमग्न मुद्रा तथा पद्मासन जैसी बैठी हुई मुद्राएँ मिलती हैं। चेहरे पर शांत भाव, अलंकरण की सीमितता और शरीर की स्थिरता इनके आध्यात्मिक आदर्शों को व्यक्त करती है।
बौद्ध, जैन और सनातन प्रतिमाओं के विकास से भारतीय मूर्तिकला में धार्मिक विषयों के अनुसार विशिष्ट प्रतिमा-विधान विकसित हुए। प्रत्येक परंपरा ने अपने धार्मिक सिद्धांतों और प्रतीकों के अनुरूप मूर्तियों की मुद्रा, लक्षण और अलंकरण निर्धारित किए।
गुप्तकालीन मूर्तिकला
गुप्तकाल, सामान्यतः चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी तक, भारतीय कला के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस समय मूर्तिकला में संतुलन, अनुपात, कोमलता, सौंदर्य और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का विशेष विकास हुआ। मथुरा और सारनाथ इसके प्रमुख केंद्र थे।
(A) सारनाथ की बुद्ध प्रतिमाएँ
सारनाथ की बुद्ध प्रतिमाएँ गुप्तकालीन मूर्तिकला की श्रेष्ठ उपलब्धियों में गिनी जाती हैं। इन प्रतिमाओं में बुद्ध को शांत, संयत और ध्यानमग्न रूप में प्रस्तुत किया गया है। चेहरे पर करुणा और आंतरिक शांति का भाव दिखाई देता है।
सारनाथ शैली की प्रतिमाओं में वस्त्र अत्यंत पतले और शरीर से सटे हुए प्रतीत होते हैं। वस्त्रों की सिलवटों को सीमित रूप में दिखाया गया है, जिससे शरीर की आकृति स्पष्ट रहती है। मुखमंडल की कोमलता, आँखों की अर्धनिमीलित स्थिति और शरीर के संतुलित अनुपात प्रतिमा को विशिष्ट आध्यात्मिक प्रभाव प्रदान करते हैं।
इन प्रतिमाओं में बाहरी शारीरिक शक्ति के प्रदर्शन की अपेक्षा आंतरिक शांति, करुणा और आत्मसंयम को अधिक महत्त्व दिया गया है। यही कारण है कि सारनाथ की बुद्ध प्रतिमाएँ भारतीय आध्यात्मिक कला की आदर्श अभिव्यक्तियों में सम्मिलित की जाती हैं।
(B) मथुरा की गुप्तकालीन कला
गुप्तकाल में मथुरा की मूर्तिकला ने अपनी पूर्ववर्ती परंपराओं को विकसित किया। यहाँ बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, विष्णु, शिव और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाई गईं।
मथुरा की गुप्तकालीन प्रतिमाओं में शरीर का संतुलन, चेहरे की सौम्यता और धार्मिक भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति दिखाई देती है। पूर्ववर्ती यक्ष परंपरा की शारीरिक दृढ़ता को अधिक संयत तथा आदर्शीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया।
(C) देवगढ़ का दशावतार मंदिर
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित देवगढ़ का दशावतार मंदिर गुप्तकालीन अथवा गुप्तकाल से संबंधित मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसके उत्कीर्ण पटल पर विष्णु से संबंधित पौराणिक आख्यानों का चित्रण मिलता है।
मंदिर की मूर्तियों में धार्मिक कथा, स्थापत्य संरचना और सजावटी तत्वों का समन्वय है। देवगढ़ की कला से यह स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल में मूर्तिकला केवल स्वतंत्र प्रतिमाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि मंदिरों की दीवारों, प्रवेशद्वारों और अन्य स्थापत्य अंगों का भी अभिन्न भाग बन चुकी थी।
(D) उदयगिरि की वराह प्रतिमा
मध्य प्रदेश स्थित उदयगिरि की गुफाओं में गुप्तकालीन मूर्तिकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण मिलते हैं। यहाँ की विशाल वराह आकृति विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसमें विष्णु के वराह अवतार को एक महाकाय रूप में दिखाया गया है, जो पृथ्वी को जल से उद्धार करते हैं।
इस विशाल उत्कीर्णन में धार्मिक आख्यान के साथ राजकीय शक्ति और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की अवधारणाओं को भी समझा जाता है। वराह का शक्तिशाली शरीर, आसपास की आकृतियाँ तथा समग्र दृश्य रचना शिल्पियों की असाधारण कल्पना और तकनीकी कौशल को प्रकट करती है।
(E) गुप्तकाल की प्रमुख विशेषताएँ
गुप्तकालीन मूर्तिकला की मुख्य विशेषताएँ हैं—
- शारीरिक अनुपात और आकृति में संतुलन।
- चेहरे पर शांति, करुणा और सौम्यता की अभिव्यक्ति।
- धार्मिक आदर्शों का कलात्मक रूपांतरण।
- वस्त्र, आभूषण और केश-विन्यास का संयत प्रयोग।
- पत्थर की सतह तथा आकृति के बीच सुंदर सामंजस्य।
- मंदिर स्थापत्य के साथ मूर्तिकला का निकट संबंध।
गुप्तकाल को भारतीय मूर्तिकला का एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय चरण कहा जा सकता है। इस समय विकसित अनेक कलात्मक आदर्शों का प्रभाव बाद की भारतीय तथा एशियाई धार्मिक कला पर पड़ा।
गुप्तोत्तर काल तथा पाल-सेन मूर्तिकला
गुप्त साम्राज्य के बाद भारतीय मूर्तिकला का विकास विभिन्न क्षेत्रीय राजवंशों के संरक्षण में जारी रहा। इस काल में धार्मिक संस्थानों, मंदिरों, मठों और स्थानीय राजसत्ताओं ने मूर्तिकला को प्रोत्साहित किया।
बिहार और बंगाल में पाल तथा सेन शासकों के समय बौद्ध, जैन और सनातन परंपराओं से संबंधित अनेक मूर्तियाँ निर्मित हुईं। इनमें काले अथवा गहरे रंग के पत्थर का उपयोग व्यापक रूप से किया गया। बुद्ध, बोधिसत्त्व, तारा, अवलोकितेश्वर, विष्णु, शिव और अन्य देवताओं की प्रतिमाएँ इस क्षेत्र की कला में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
पाल कला में प्रतिमाओं के चारों ओर अलंकृत पृष्ठपट, सूक्ष्म आभूषण, मुकुट, प्रभामंडल और छोटी सहायक आकृतियों का अंकन मिलता है। मूर्तियों में धार्मिक प्रतीकों की व्यवस्था अधिक विस्तृत दिखाई देती है।
इस काल की प्रतिमाएँ पूर्वी भारत की धार्मिक परंपराओं तथा शिल्प तकनीक के विकास का प्रमाण हैं। बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ इस क्षेत्र की कला का संपर्क नेपाल, तिब्बत और अन्य हिमालयी क्षेत्रों की प्रतिमा-परंपराओं से भी हुआ।
दक्षिण भारतीय मूर्तिकला
दक्षिण भारत में मूर्तिकला का विकास पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल और अन्य राजवंशों के समय अत्यंत समृद्ध रूप में हुआ। यहाँ की कला में शैलगृहों, एकाश्म मंदिरों, संरचनात्मक मंदिरों तथा धातु प्रतिमाओं का विशेष महत्त्व है।
(A) ऐहोल और बादामी
कर्नाटक के ऐहोल और बादामी क्षेत्र में चालुक्यकालीन मंदिरों तथा गुफाओं में उत्कृष्ट मूर्तिकला देखने को मिलती है। इन स्थलों पर शिव, विष्णु, नृसिंह, त्रिविक्रम, हरिहर और अन्य धार्मिक रूपों की प्रतिमाएँ निर्मित हुईं।
यहाँ की मूर्तियों में गतिशीलता, शारीरिक बल, अलंकरण और पौराणिक आख्यानों की प्रस्तुति का सुंदर संयोजन है। गुफाओं के भीतर उत्कीर्ण प्रतिमाएँ प्राकृतिक चट्टान को कलात्मक रूप देने की दक्षता दर्शाती हैं।
(B) मामल्लपुरम की मूर्तिकला
तमिलनाडु के मामल्लपुरम, जिसे महाबलीपुरम भी कहा जाता है, में पल्लव राजाओं के संरक्षण में सातवीं और आठवीं शताब्दी के दौरान शैलकृत मंदिर, एकाश्म रथ, गुफा-मंदिर तथा विशाल उभरे हुए शिल्प-पटल निर्मित किए गए।
यहाँ का प्रसिद्ध गंगावतरण अथवा अर्जुन की तपस्या नाम से जाना जाने वाला विशाल शैल-उत्कीर्णन भारतीय मूर्तिकला की असाधारण उपलब्धियों में गिना जाता है। इसमें देवताओं, ऋषियों, मानवों, पशुओं और नागों सहित अनेक आकृतियों का संयोजन किया गया है। प्राकृतिक चट्टान की दरार को भी दृश्य-रचना में प्रभावशाली ढंग से उपयोग किया गया है।
मामल्लपुरम की कला में धार्मिक आख्यानों को विशाल सार्वजनिक शिल्प के रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता दिखाई देती है। यूनेस्को के अनुसार, यहाँ की शैलकृत और एकाश्म रचनाएँ पल्लवकालीन स्थापत्य तथा मूर्तिकला की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं।
(C) एलोरा और एलीफैंटा
महाराष्ट्र स्थित एलोरा और एलीफैंटा की गुफाएँ भारतीय शैलकृत मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। एलोरा में बौद्ध
